गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

यह डराने का डबल खेल है...! इस तरफ से भी, उस तरफ से भी...। डरना तो बनता है!!!

rahul with modi waqf board
By Jayjeet

हमारे यहां सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, उन्हें तमाम ऐसे मसलों पर चर्चा करने में बड़ा आनंद आता है, जिनमें धर्म का जरा-सा भी एंगल हो.... वक्फ बोर्ड विधेयक पर सदन में सुचारू चर्चा होगी, इस बात की पूरी संभावना थी। और यही हुआ। 12 घंटे तक संसद इस मुद्दे पर चर्चा करती रही।
बेशक, यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इस पर बेरोक-टोक चर्चा सिर्फ इसलिए नहीं हुई कि यह बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है। सुचारू रूप से चर्चा इसलिए हुई, क्योंकि इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अपने-अपने नरेटिव्स को और भी मजबूती देने में मदद मिली... मानों मिलीभगत हो... तुम भी कहो, हम भी कहें... गोया कि जनता के लिए तो हर दिन 1 अप्रैल है...!
सत्ताधारी दल, और कमोबेश सरकार भी, जिसे मुस्लिमों के प्रति अपनी घृणा को छिपाना कभी नहीं आया, के लिए यह अपने कोर सनातनी मतदाताओं के सामने इस नरेटिव को ताकतवर बनाने का मौका था कि देखो, हम अब किस तरह से मुस्लिम समुदाय के गिरेबान में हाथ डाल सकते हैं। कानून के जरिए उनके धार्मिक स्थलों तक हमारी पहुंच होगी। इससे उसे अपने मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता को बढ़ाने का मौका मिला है।
विपक्षियों के बीच 'एक अनार, सौ बीमार' जैसी स्थिति रही। हर किसी में मुस्लिम समुदाय का पैरोकार दिखने की होड़ नजर आई (नागपुर इस पर मंद-मंद मुस्करा भी रहा होगा!)। सदन में बिल को फाड़ने की औवेसी की तस्वीर तो इतनी ऐतिहासिक बन गई कि वह उनकी अगली एक-दो पीढ़ियों को भी वोट दिलाती रहेगी।
खासकर कांग्रेस की समस्या बड़ी विकट है। मुस्लिमों का मसला अब उससे न निगलते बनता है, न उगलते। कांग्रेस करीब 55 साल तक केंद्र की सत्ता में रही है, लेकिन उसने मुस्लिमों को मुख्य धारा से इतना काटकर रखा कि आज न वह उनके असल मुद्दों को समझने की स्थिति में है, न उन्हें समझाने की स्थिति में। राहुल अब भी उस रटे-रटाए मुआवरे को दोहराते नजर आए कि ‘यह बिल मुसलमानों की सम्पत्ति को हड़पने के लिए बनाया गया।'
दरअसल, वक्फ वाला पूरा इश्यू डराने का डबल खेल है। भाजपा एंड पार्टी ने वक्फ बोर्ड के नाम पर यह नरेटिव सेट किया कि बोर्ड किसी की भी संपत्ति हड़प सकता है (वैसे ही जैसे हिंदू महिलाओं के मंगलसूत्र लूट लिए जाएंगे!)। विपक्षी दलों ने भी काउंटर में डराने का खेल खेला कि इससे मुस्लिमों का सबकुछ छीन लिया जाएगा। फिर उनसे कोई नहीं पूछ रहा कि आपने सत्ता में रहते ऐसा कुछ दिया भी है, जिसे छिना जा सके? शिक्षा, नौकरी, कारोबार! कांग्रेस तो 55 साल सत्ता में रही।
पुनश्च... हिंदू मुसलमान से डर रहा है, मुसलमान हिंदू से.... मगर हमें डरना चाहिए AI/AGI से, जलवायु परिवर्तन से। ये ईश्वर की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। मगर चूंकि ये कमबख्त हमें डराते नहीं हैं, इसलिए संसद की चर्चाओं में भी नहीं आते।
(तस्वीर : एआई से जनरेट की हुई)

मंगलवार, 25 मार्च 2025

Satire : व्यंग्य लिखने की अनुमति प्रदान करने बाबत अनुरोध-पत्र


 

प्रति,

श्री फलाना साहेब
व्यंग्य परीक्षण अधिकारी
नई दिल्ली
विषय : आदरणीय मंत्री महोदय के संबंध में व्यंग्य लिखने की अनुमति बाबत
महोदय
सेवा में दंडवत अनुरोध है कि मैं सरकार में कार्यरत आदरणीय मंत्री महोदय (नाम का उल्लेख) के संबंध/समर्थन में एक व्यंग्य लिखना चाहता हूं। मैं इस व्यंग्य में आपकी व्यंग्य लेखन नियमावली, 2025 के निम्नलिखित नियमों का पालन करने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता हूं।
- नियम क्रमांक 1, कंडिका ख(2) के तहत मैं ऐसे किसी भी शब्द का उपयोग नहीं करूंगा, जिससे मंत्रीजी की भावनाओं को ठेस पहुंचती हो। इसके उप-नियम (3) के तहत समर्थकों/लठैतों की भावनाओं का भी पूरा खयाल रखूंगा।
- नियम क्रमांक 2 के 'भाई-भतीजवाद' खंड, कंडिका ग (3) के तहत मैं ऐसे किसी भी प्रकरण की बात नहीं करुंगा, जो यह बताता हो कि उन्होंने नियमों का उल्लंघन करके अपने परिवार के कितने सदस्यों को कितनी हेक्टेयर जमीन दिलवाने और कितने अयोग्य रिश्तेदारों को नौकरियां दिलवाने में सहायता की।
- नियम क्रमांक 4, कंडिका ख (2) के तहत मैं उनके द्वारा किए गए किसी भी दलबदल पर कोई टिप्पणी नहीं करुंगा, तदनुसार उनके प्रति 'गद्दार' जैसे असंसदीय शब्द का इस्तेमाल भी नहीं करंगा। ऐसे शब्द या इसी तरह के ऐसे शब्द जिससे इस प्रकार का भाव अभिव्यक्त होता हो, का उपयोग होने पर मैं अपने खिलाफ देश-द्रोह का मामला दर्ज किए जाने की सहर्ष अनुमति देने को तैयार रहूंगा।
- नियम क्रमांक 3, कंडिका घ (1) के तहत मैं उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उल्लेख नहीं करुंगा। उनके खिलाफ 23 मामलों की जो जांच लंबित है, उस संदर्भ में मैं 'जांच' शब्द का भी उपयोग नहीं करुंगा।
- नियम क्रमांक 1, कंडिका ख(6) के तहत मैं उस नियम का पूर्णरूपेण अनुपालन करुंगा, जिसमें मंत्रीजी की प्रशंसा में 10 पंक्तियां लिखना अनिवार्य हैं।
कृपया मुझे आदरणीय उक्त मंत्री महोदय के संबंध में व्यंग्य लिखने की सशर्त अनुमति प्रदान करने की कृपा करें।

भवदीय
ढिकाना कुमार
-------------

#kunal kamra, #कुणाल कामरा, #व्यंग्य, #satire, #जयजीत अकलेचा

मंगलवार, 18 मार्च 2025

हम Grok पर मजे ले रहे हैं, उधर हो सकता है, मस्क हमारे मजे ले रहे हों!

 

By Jayjeet Aklecha

पता नहीं क्यों, आज हम हर बात में खेल-तमाशे ढूंढ लेते हैं। अब लाखों-करोड़ों लोगों को ग्रोक (Grok) में मजा आ रहा है। कई लोग इस गलतफहमी में हैं कि देखिए कैसे ग्रोक ने मोदी और मोदीभक्तों की पोल खोल दी। हममें से किसी को इस बात का एहसास भी नहीं है कि इस कथित पोल-पट्‌टी पर अमेरिका में मस्क बैठे-बैठे हंस रहे हैं। आज मोदी विरोधी लोगों को आनंद आ रहा है, कल राहुल-गांधी परिवार के विरोधियों को आनंद आएगा।

 दरअसल, ग्रोक वह चैटबॉट है जो सीखने की प्रोसेस में है। कोई भी एआई बॉट रियल वर्ल्ड के डेटा से ही सीखता है। मस्क ने ट्विटर को खरीदा ही इसलिए था कि वे अपने आने वाले एआई मॉडल को उसके जरिये सिखा सकें (मस्क के लिए ट्विटर को खरीदना वैसा ही था, जैसे हम राह चलते कोई छोटी-मोटी चीज खरीद लेते हैं)। मस्क को ट्विटर की खरीदी से पहले ही एहसास हो गया था कि किसी भी एआई बॉट को सिखाने के लिए ट्विटर से बड़ा सोर्स कुछ और नहीं होगा। साल 2022 की शुरुआत में ही उन्होंने कह दिया था कि ट्विटर (अब X) की हर दिन की 50 करोड़ मानव पोस्ट किसी भी एआई को सीखने के लिए एक बहुत बड़ा खजाना है।

 मेरा अनुमान है कि उनके एआई बॉट को ट्विटर (X) की सामान्य पोस्ट्स से जितना सीखना था, सीख लिया। अब हो सकता है यह ग्रोक के लिए डायरेक्ट अग्रेसिव लर्निंग की प्रोसेस का दौर हो। और इसके लिए क्या करना था? बस, बाजार में एक पॉलिटिकल ट्रेंड फेंकना था। भारत में यह करना बहुत आसान है। यह दुनियाभर के समझदार लोगों को पता है। मस्क की कंपनी ने शायद यही किया है। करोड़ों लोगों ने दो-चार दिन में ही बैठे-ठाले, फ्री में ग्रोक को बहुत-सी बातें सिखा दी हैं। फिर हम सब मूर्ख फिर से एक कॉर्पोरेट घराने के टूल्स बन गए।

 

 

रविवार, 9 मार्च 2025

आखिर हमारे नेता लोग इतनी असहिष्णुता लाते कहां से हैं?

By Jayjeet Aklecha

लगता है हमारे नेताओं ने कबाड़ा करने का मानो बीड़ा उठा लिया है। हम धर्म और जाति के कटु बाणों से पहले से ही लहूलुहान हैं और अब नेताओं के तरकश में भाषा का एक नया तीर आ गया है (वैसे नया नहीं है, पर उसके फलक पर लगा जहर नया है)। बात तमिलनाडु के बाद महाराष्ट्र तक पहुंच गई है। आरएसएस के भैयाजी जोशी ने यह लाइन ‘पूरे मुंबई की भाषा मराठी नहीं है’ क्या कह दी, राजनीति का भाषाई वितंडा शुरू गया। सबसे पहले उद्धव बोले- ‘भैयाजी के खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज हो।'
फिर मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस को लगा कि वे इस राजनीति में पीछे ना रह जाए। तो विधानसभा में कहा कि मुंबई और महाराष्ट्र में रहने वालों को मराठी सीखनी ही चाहिए। अगर भविष्य में फड़णवीस को महासचिव बनाकर तमिलनाडु का प्रभार सौंपा जाता है तो क्या वे वहां रहकर तमिल सीखेंगे! फिर कनार्टक तो कन्नड़ा सीखेंगे, फिर असम तो क्या असमिया सीखेंगे? सवाल यह है कि क्या भारत के प्रांतों में कोई भारतीय अपनी पसंद की भाषा बोलकर नहीं रह सकता?.. और अगर नहीं रह सकता तो 1857 के पूर्व वाली स्थिति बहाल कर दीजिए। वैसे भी राज्यों के कर्णधार तो अब राजाओं वाली भाषा व जीवन-शैली का ही निर्वाह कर रहे हैं।
शीर्षक में मेरा जो सवाल था, अब उस पर आते हैं- आखिर नेता इतनी असहिष्णुता लाते कहां से हैं? इसका सीधा-सा कटु जवाब है- जनता से। ये तमाम नेता हम जनता को धर्म, जाति और भाषा पर इसलिए मूर्ख बना पा रहे हैं, क्योंकि हम बनना चाह रहे हैं। जिस दिन हम उनसे कहने लगेंगे : नेताजी, धर्म, जाति और भाषा को छोड़िए..., आप तो ये बताइए मेरी नौकरी का, मेरी पेंशन का, मेरी सेहत का, मेरे बच्चे की शिक्षा का, मेरी फसलों का, मेरे पशुओं के बारे में आपने क्या सोचा है? यकीन मानिए, उस दिन से सबकी सहिष्णुता लौट आएगी।
पुश्नच… औरंगजेब पर एक नेता ने कोई टिप्पणी की तो एक राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री की टिप्पणी थी – ‘उन्हें हमारे प्रदेश में भिजवा दीजिए। हम उनका इलाज करवा देंगे...।’ औरंगजेब जैसे शासकों की तो यह भाषा हो सकती है, मगर लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए नेता भी अगर उसी तरह की असहिष्णुता का निर्वाह करने लगेंगे, तो फिर हमें सोचना होगा कि हमारा सबसे महान लोकतंत्र किस राह पर आगे बढ़ चला है।

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

हम नदियों को केवल पवित्र मानते हैं, मगर जरूरत उन्हें पवित्र रखने की है!

pollution in gaga, mahakumbh, प्रयागराज, गंगा नदी में प्रदूषण, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट, योगी आदित्यनाथ, डावकी नदीं
By Jayjeet Aklecha

पता नहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में ऐसे कौन-से वामपंथी अधिकारी बैठे हुए हैं, जिन्होंने पवित्र गंगा नदी के पानी को प्रदूषित बता दिया। खैर, महंत योगीजी ने उप्र विधानसभा में कह दिया कि गंगा का पानी इतना पवित्र है कि उसका आचमन भी किया जा सकता है तो हम मान सकते हैं कि हां, ऐसा ही होगा! उन्होंने इस रिपोर्ट को महाकुंभ को बदनाम करने की साजिश भी करार दिया (साजिश के इस आरोप का जवाब क्या केंद्र सरकार देगी?) वैसे अगर संगम के जिस आम एरिया में जहां आम लोग पवित्र स्नान वगैरह कर रहे हैं, वहां योगीजी अपनी पूरी कैबिनेट और वरिष्ठ अफसरों के साथ जाकर उस पानी का आचमन करके दिखाते तो यह बोर्ड के साजिशकर्ता अधिकारियों को मुंहतोड़ जवाब होता...!

 वैसे, योगीजी को ऐसा करने की जरूरत नहीं है। हालांकि उन्हें उस रिपोर्ट को खारिज करने की भी जरूरत नहीं थी। कोई भी समझदार आदमी इस सच को स्वीकार करता ही कि करोड़ों लोगों के पवित्र स्नान करने के बाद नदी तो क्या, विशालकाय समुद का पानी भी मानव मल-मूत्र के बैक्टीरिया से बच नहीं पाता। लेकिन शुतुरमुर्गी मानसिकता के चलते दिक्कत यह है कि हम समस्या को स्वीकारते नहीं और इसलिए समस्या सुलझती भी नहीं है। यही वजह है कि दुनिया की टॉप 10 या 15 शीर्ष स्वच्छ नदियों की सूची में हमारी कोई भी पवित्र नदी शामिल नहीं है (केवल मेघालय की छोटी-सी नदी डावकी नदी को छोड़कर। देखें तस्वीर)।


दिक्कत यह भी है कि हम नदियों को केवल पवित्र मानते हैं, उन्हें पवित्र रखने की कोशिश नहीं करते। अगर नदियों को पवित्र रखना हमारा मकसद होता तो महाकुंभ या ऐसे ही आयोजनों को लेकर हमारी सरकारों की रणनीति कुछ अलग होती। लेकिन भारत में ऐसी अलग नीति की उम्मीद नहीं कर सकते...इसलिए हमें ‘पूरब और पश्चिम’ के उस उस फिल्मी गीत को दोहराकर ही संतुष्ट रहना होगा कि ‘हम उस देश के वासी हैं, जहां नदियों को भी माता कहकर बुलाते हैं’ (फिर एक कड़वा विरोधाभास... महिलाओं के खिलाफ छोटे-बड़े अपराधों के मामले में भारत की स्थिति अनेक विकासशील देशों से बदतर है)

 तस्वीर : मेघालय की डावकी नदी। यह इसलिए भी इतनी स्वच्छ है, क्योंकि इसके पानी को ‘पवित्र’ नहीं माना जाता है।

#जयजीत अकलेचा

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

जब अगले सप्ताह ट्रम्प से मिलें मोदीजी तो सिकंदर-पोरस की कहानी जरूर सुनाएं…

By Jayjeet Aklecha

हमारे प्रधानमंत्रीजी की एक अच्छी खासियत यह है कि वे जब भी किसी दूसरे देश के राष्ट्रपतिजी या प्रधानमंत्रीजी से मिलते हैं, तो उनसे गले लगकर मिलते हैं। इससे समकक्ष होने का एहसास होता है। सवाल यह है कि जब अगले सप्ताह मोदीजी की ट्रम्पजी से मुलाकात होगी तो तब भी वे क्या ट्रम्प से वैसे ही गले लगकर मिलेंगे? और क्या ट्रम्प उनसे गले लगना चाहेंगे? और सबसे बड़ा सवाल यह भी कि क्या ट्रम्प उन्हें (या किसी और भी) अपना समकक्ष मानते भी हैं?
भारतीय आप्रवासियों (भले ही अवैध हों) को जिस तरह से आतंकियों की तरह भारत भेजा गया, उससे कोई घोर ‘गैर राष्ट्रवादी’ भी आहत हुए बगैर नहीं रह सकता। यह काम तो पाकिस्तान जैसा कथित शत्रु भी नहीं करता, जैसा अमेरिका जैसे कथित मित्र ने किया है। और विदेश मंत्री एस. जयशंकर का वह बयान तो और भी ज्यादा पीड़ादायक है, जिसमें वे कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। अमेरिका की यही रणनीति है। उनके बयान को पढ़कर ऐसा महसूस हो रहा है कि वे अमेरिका की ओर से ‘भारत देश’ को सफाई दे रहे हैं। और लगे हाथ वे यह जोड़ना भी नहीं भूले कि पहले भी (2012 में कांग्रेस सरकार के दौरान) ऐसा होता रहा है। तो क्या भविष्य में अगर कोई गैर भाजपा सरकार सत्ता में आती है तो क्या वह इतनी ही बेहयाई से यह कहकर आतंकियों को रिहा कर देगी कि पहले भी ऐसा हुआ है (1999, कंधार)! क्या भविष्य के ऐसे कृत्यों को अतीत के आधार पर जस्टिफाई किया जा सकता है?
खैर, जब मोदी जी अपने दोस्त ट्रम्प ने मिले तो उन्हें सिकंदर और राजा पोरस की वह कहानी जरूर याद करनी चाहिए और हो सके तो सुनाना भी चाहिए। कहानी आप सब जानते ही हैं कि जब परास्त पोरस ने भी सिकंदर जैसे बलशाली राजा से यह कहने की हिम्मत की थी- एक शासक को दूसरे शासक के साथ हमेशा शासक जैसा ही सलूक करना चाहिए... यह बात देशों पर भी लागू होनी चाहिए।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

आठवें वेतन आयोग और टैक्स रिबेट से तो पैसा बाजार में आएगा, लेकिन गरीबों को मदद सिस्टम पर बोझ!

By Jayjeet

समाज में विषमता केवल पैसे से पैदा नहीं होती। सोच से भी होती है। बीते दिनों दो बड़ी घटनाएं प्रकाश में आईं- एक, सरकार द्वारा आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा और दूसरी, 12 लाख रुपए तक की आय पर इनकम टैक्स में रिबेट का बजटीय एलान। बेशक, ये दोनों फैसले बहुप्रतीक्षित थे और इससे बड़े वर्ग को राहत मिलेगी। इन दोनों घटनाओं का सरकारी बाशिंदों की तरफ से, समाज के एक बड़े तबके की तरफ से और मीडिया की तरफ से भी यह कहकर अभिनंदन किया गया कि इनसे बड़ी धनराशि बाजार में आएगी और इकोनॉमी को गति मिलेगी। बेशक, काफी हद तक ऐसा होगा।
लेकिन एक बड़ा सवाल - अगर उक्त फैसले इकोनॉमी को गति देने वाले साबित होंगे तो फिर देश के विशालकाय गरीब तबके, खासकर गरीब वर्ग की महिलाओं को मिलने वाली वाली राशि बोझ कैसे हो सकती है? आज यह सवाल केवल इसलिए क्योंकि समाज के बड़े वर्ग की ओर इसे बोझ के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है, और इसमें वह भी शामिल है, जिसे उक्त फैसलों से लाभ मिलने वाले हैं। यह उन्हीं लोगों से सवाल है कि अगर वो पैसा बाजार में आकर इकोनॉमी को बढ़ाएगा तो कि क्या गरीबों को दिया जाने वाला पैसा उनकी तिजोरियों में जमा हो रहा है या वह ब्लैक इकोनॉमी में जा रहा है?
सबसे आपत्तिजनक शब्द ‘रेवड़ी' है। क्योंकि अगर ये रेवड़ी है तो साल में 150 दिन छुटि्टयां लेने वाले सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन की बड़ी राशि को क्या कहा जाएगा? (साल भर पहले एक अखबार द्वारा करवाए गए एक सर्वे में इसी वर्ग ने गरीबों को मिलने वाली कथित रेवड़ियों पर सबसे ज्यादा आपत्ति जताई थी)। इसलिए सबसे पहले तो ‘रेवड़ी’ शब्द से मुक्ति पाने की जरूरत है, क्योंकि न वो रेवड़ी है और न ये रेवड़ी है। इसी तरह एक व्यापक स्टडी की भी जरूरत है कि गरीबों को सरकारी मदद के बाद से आर्थिक और सामाजिक तौर पर क्या बदला। कुछ बदला भी या नहीं? हालांकि जिस देश में 15 साल से जनगणना तक ना हुई हो और फिर भी देश को या देशवासियों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा हो, वहां इस तरह के असर को जानने के लिए भी कोई ललक होगी, इसकी संभावना कम ही होगी।
पुनश्च... ब्राजील में पिछले 20 साल से एक योजना चल रही है ‘बोल्सा फैमीलिया' योजना। इसमें भी महिलाओं को प्रतिमाह कुछ राशि नकद दी जाती है। इस पर विश्व बैंक की स्टडी कहती है कि इस योजना के तहत खर्च किए गए प्रत्येक एक डॉलर पर स्थानीय अर्थव्यवस्था में 1.78 डॉलर जनरेट हुए। जाहिर है, इकोनॉमी में जनरेट हुई असेट का फायदा तमाम लोगों को मिला होगा!!! बता दें, वहां न तो यह योजना (कमोबेश) राजनीति से प्रेरित है और न ही इसे ‘रेवड़ी’ माना जाता है।

रविवार, 2 फ़रवरी 2025

AI को लेकर हमारा शुतुरमुर्गी रवैया… ऐसे तो विश्वगुरु बनने से रहे!!!

 

India AI development, jayjeet aklecha, जयजीत अकलेचा, एआई में भारत कहां, शुतुरमुर्ग

By Jayjeet Aklecha

कई लोगों को भारत को ‘विश्वगुरु’ बोलते हुए एक किस्म की मानसिक शांति का एहसास होता है। इसमें संस्कृति से जुड़ाव महसूस करते हुए दुनिया पर भारत के वर्चस्व की आकांक्षा दिखती है। लेकिन क्या हम विश्वगुरु केवल कहने मात्र से बन जाएंगे? 

हमें बीते 10 दिनों के दौरान हुई दो घोषणाओं पर गौर करना चाहिए। ये आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) को लेकर है। पहली घोषणा अमेरिका में हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के दो दिन बाद ही 22 जनवरी को डोनाल्ड ट्रंप ने एआई के विकास के लिए 500 अरब डॉलर (43,34,500 करोड़ रुपए) के (प्राइवेट फर्म्स के साथ) ज्वाइंट वेंचर की घोषणा की। दूसरी घोषणा कल आए भारत के केंद्रीय बजट में हुई। इसमें एआई के लिए 500 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान रखा गया है। इन दोनों की तुलना करने के लिए जमीन-आसमान का अंतर वाला मुहावरा भी बहुत छोटा पड़ जाएगा।

बेशक, एआई को लेकर हममें से किसी को कुछ पता नहीं है और इसलिए हम इसे बड़ा खतरा मान सकते हैं (और मानना भी चाहिए)। ऐसे में अगर सरकार की मंशा एआई को हतोत्साहित करने वाली है, तो यह अच्छा है। लेकिन सवाल यह भी है कि केवल ऐसी मंशा रखने से भर क्या होगा? क्या हम दुनिया से (खासकर अमेरिका और चीन से) आते इससे खतरे को रोक पाएंगे? यह केवल शुतुरमुर्गी रवैया है कि हम सिर छुपाकर समझ लेंगे कि तूफान से बच गए। लेखक युवाल नोआ हरारी ने अपनी ताजा-तरीन किताब ‘नेक्सस' में इसे और स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि जिस तरह पर्यावरण के नियमों का पालन करने भर से जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचा नहीं जा सकता, उसी तरह एआई को नियंत्रित करने या हतोत्साहित करने से हम इसके खतरों से नहीं बच सकते, क्योंकि ये दोनों स्थानीय नहीं, वैश्विक समस्याएं हैं।

मुझे पक्का भरोसा है कि हमारे यहां की कोई भी सरकार इतनी समझदार या संवेदनशील नहीं हो सकती कि उसने एआई के लिए इतना अल्प बजट केवल इसलिए रखा है, क्योंकि उसकी सुमंशा इसके खतरों को रोकना है। दरअसल, यह हमारी तमाम सरकारों की वैज्ञानिक सोच के प्रति उस उदासीनता का प्रतीक है, जो आज से नहीं है, और जिसे वे दशकों से बरतते आ रही हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान और वैज्ञानिक मानसिकता ही हमें वैश्विक ताकत में बदल सकती है, इसको लेकर सरकार के स्तर पर कोई सोच नहीं है, न रही है। हम आज भी महज हमारे विशाल बाजार के भरोसे खुद को वैश्विक ताकत में बदलने का ख्वाब देख रहे हैं। आज भी हममें से कई लोग, दुर्भाग्य से सरकार-शासन और वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों मंे बैठे लोग भी, मायथोलॉजी के आधार पर उन प्राचीन ‘इनोवेशन’ पर गर्व करते अघाते नहीं कि कैसे दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी हमारे यहां हुई या कैसे हमने दुनिया को विमान उड़ाना सिखाया। अक्षत गुप्ता जैसे लेखक इसे ‘सत्यालॉजी’ कहकर इस भ्रम को और गैर-जरूरी बढ़ावा देते हैं। दुर्भाग्य यह भी कि हमारे यहां किसी सरकार की सफलता का पैमाना यह बन जाता है कि वह किसी बड़े धार्मिक आयोजन को कितने अच्छे तरीके से हैंडल कर पाती है।

भारत सरकार एआई को प्रोत्साहित न करें, अच्छी बात है। लेकिन एक यह तथ्य हमें डरा रहा है कि इसकी अवहेलना करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आईबीएम एआई एडॉप्शन इंडेक्स की मानें तो एआई को स्वीकार करने के मामले में दुनिया में नंबर वन पर भारत है (59 फीसदी बिजनेस कंपनियों ने एआई को एडॉप्ट करने की इच्छा जताई है), जबकि हमारे पास अपना कोई एआई नहीं है। हो सकता है आगे जाकर हम इस पर भी ‘गर्व’ करने लगे कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती एआई कंट्री है, जैसे हम स्मार्टफोन के सबसे बडे एक्सपोर्टर होने पर गर्व करते हैं, जबकि हमारे पास अपना एक ढंग का स्मार्टफोन तक नहीं है।

तो सवाल यह है कि हम या हमारी सरकार क्या करें? सबसे पहले तो हम दिल पर पत्थर रखकर यह स्वीकारें कि खुद को दुनिया की चौथी या पांचवीं आर्थिक शक्ति मानना केवल एक भ्रम है। असल शक्ति न्यू एज इनोवेशन में है। न्यू एज इनोवेशन की गंगा में स्नान करके ही हम असल में 'विश्व गुरु' बन सकते हैं।

गुरुवार, 30 जनवरी 2025

गोडसे ने बापू की डायरी में यह क्यों लिखा : 1,10,234 …?

 

gandhi-godse


By Jayjeet


गोडसे ने आज फिर बापू की डायरी ली और उसमें कुछ लिखा।

गांधी ने पूछा- अब कितना हो गया है रे तेरा डेटा?

एक लाख क्रॉस कर गया बापू। 1 लाख 10 हजार 234… गोडसे बोला

गांधी – मतलब सालभर में बड़ी तेजी से बढ़ोतरी हुई है।

गोडसे : हां, 12 परसेंट की ग्रोथ है। बड़ी डिमांड है …. गोडसे ने मुस्कराकर कहा…

गांधीजी ने भी जोरदार ठहाका लगाया…

-----

नए-नए अपॉइंट हुए यमदूत से यह देखा ना गया। गोडसे के रवाना होने के बाद उसने अनुभवी यमदूत से पूछा- ये क्या चक्कर है सर? ये गोडसे नरक से यहां सरग में बापू से मिलने क्यों आया था?

अनुभवी यमदूत – यह हर साल 30 जनवरी को नर्क से स्वर्ग में बापू से मिलने आता है। इसके लिए उसने स्पेशल परमिशन ले रखी है।

नया यमदूत – अपने किए की माफी मांगने?

अनभवी – पता नहीं, उसके मुंह से तो उसे कभी माफी मांगते सुना नहीं। अब उसके दिल में क्या है, क्या बताए। हो सकता है कोई पछतावा हो। अब माफी मांगे भी तो किस मुंह से!

नया – और बापू? वो क्यों मिलते हैं उस हरामी से? उसके दिल में भले पछतावा हो, पर बापू तो उसे कभी माफ न करेंगे।

अनुभवी – अरे, बापू ने तो उसे उसी दिन माफ कर दिया था, जिस दिन वे धरती से अपने स्वर्ग में आए थे। मैं उस समय नया-नया ही अपाइंट हुआ था।

नया – गजब आदमी है ये… मैं तो ना करुं, किसी भी कीमत पे..

अनुभवी – इसीलिए तो तू ये टुच्ची-सी नौकरी कर रहा है…

नया – अच्छा, ये गोडसे, बापू की डायरी में क्या लिख रहा था? मेरे तो कुछ पल्ले ना पड़ रहा।

अनुभवी – यही तो हर साल का नाटक है दोनों का। हर साल गोडसे 30 जनवरी को यहां आकर बापू की डायरी को अपडेट कर देता है। वह डायरी में लिखता है कि धरती पर बापू की अब तक कितनी बार हत्या हो चुकी है। गोडसे नरक के सॉफ्टवेयर से ये डेटा लेकर आता है।

नया – अच्छा, तो वो जो ग्रोथ बोल रहा था, उसका क्या मतलब?

अनुभवी – वही जो तुम समझ रहे हो। पिछले कुछ सालों के दौरान गांधी की हत्या सेक्टर में भारी बूम आया हुआ है।

नया – ओ हो, इसीलिए इन दिनों स्वर्ग में आमद थोड़ी कम है…

अनुभवी – अब चल यहां से, कुछ काम कर लेते हैं। वैसे भी यहां मंदी छाई हुई है। नौकरी बचाने के लिए काम का दिखावा तो करना पड़ेगा ना… हमारी तो कट गई। तू सोच लेना….


(Disclaimer : इसका मकसद गांधीजी को बस अपनी तरह से श्रद्धांजलि देना है, गोडसे का रत्तीभर भी महिमामंडन करना नहीं… )

#gandhi #godse 

रविवार, 26 जनवरी 2025

एआई: नए अध्याय का सूत्रपात या आखिरी गलती? (Book Review of 'Nexus' )


Book Review of Nexus , Yuval Noah Harari, Nexus in Hindi, नेक्सस बुक हिंदी में, जयजीत अकलेचा

By जयजीत अकलेचा

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के गॉडफादर कहे जाने वाले जैफ्री ई. हिंटन को बीते साल अक्टूबर माह में जब भौतिकी के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा था, तब उनके शब्द थे- ‘हमें एआई के बुरे असर को लेकर भी चिंतित होना चाहिए।’ जिस वक्त हिंटन अपनी ये चिंता व्यक्त कर रहे थे, लगभग उसी समय युवाल नोआ हरारी अपनी सद्य प्रकाशित किताब ‘नेक्सस' के जरिए इसी चिंता को और विस्तार दे रहे थे।

‘सेपियन्स’ के बेस्टसेलिंग लेखक हरारी की यह किताब, जिसका हाल ही में हिंदी संस्करण आया है , पाषाण युग से लेकर आधुनिक काल तक के सूचना तंत्रों का एक संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत करती है। लेकिन इसका सबसे रोचक और रोमांचक हिस्सा (और बेशक डरावना भी) वह तीसरा खंड है, जो एआई और उससे जुड़ी राजनीति पर विमर्श करता है।

दुनिया में एक वर्ग एआई को लेकर जितना उत्साहित या बेफिक्र है, हरारी उतने ही चिंतित नजर आते हैं। वे इसे वैश्विक संकट की आहट मानते हैं। वे लिखते हैं, ‘जिस तरह से जलवायु परिवर्तन उन देशों को भी तबाह कर सकता है, जो पर्यावरण के नियमों का पालन करते हैं, क्योंकि यह राष्ट्रीय समस्या नहीं है। उसी तरह एआई भी एक वैश्विक समस्या है। ऐसे में कुछ देशों का यह सोचना महज उनकी मासूमियत से ज्यादा कुछ नहीं होगा कि वो अपनी सरहदों के भीतर एआई को समझदारी के साथ नियंत्रित कर सकते हैं।’ वे साफ तौर पर आगाह करते हैं कि हमने जिस कृत्रिम मेधा का निर्माण किया है, अगर उसे ठीक से बरतते नहीं हैं तो यह न केवल धरती से मानव वर्चस्व को, बल्कि स्वयं चेतना के प्रकाश को भी खत्म कर देगी।

एआई के प्रति हरारी का दृष्टिकोण अत्यंत निराशावादी लग सकता है (‘गार्डियन’ के शब्दों में कहें तो ‘अपोकैलिप्टिक’ यानी सर्वनाश का भविष्यसूचक)। लेकिन जिन शब्दों तथा तथ्यों की रोशनी में वे बात करते हैं, वह यथार्थपरक भी प्रतीत होता है। वे एक टर्म ‘डेटा उपनिवेशवाद' का प्रवर्तन भी करते हैं और घोषित करते हैं कि जो भी डेटा को नियंत्रित करेगा, दुनिया पर भी उसी का वर्चस्व होगा, बशर्ते यह दुनिया अपने मौजूदा अस्तित्व को बनाए व बचाए रखे। वे दुनिया के अस्तित्व को लेकर बार-बार चिंताएं जताते हैं और बहुत ही वाजिब सवाल पूछते हैं, ‘अगर हम इतने विवेकवान हैं तो फिर इतने आत्मविनाशकारी क्यों हैं?’

हालांकि निराशाओं के बीच भी वे किताब की अंतिम पंक्तियों में, मगर छिपी हुई चेतावनी के साथ, क्षणिक-सी आशा बिखेरते हुए लिखते हैं, 'आने वाले वर्षों में हम सभी जो भी निर्णय लेंगे, उससे ही यह तय होगा कि इस अजनबी बुद्धि (एआई) का आह्वान करना हमारी आखिरी गलती है या इससे जीवन के विकास में एक नए अध्याय का सूत्रपात होगा।’

hashtagNexus... hashtagYuvalNoahHarari hashtagJayjeet_Aklecha

शुक्रवार, 3 जनवरी 2025

केवल अंग्रेजी नव वर्ष को ताना मारने से क्या होगा?

By Jayjeet

नए साल की शुभकामनाओं का सिलसिला अब तक जारी है। इस बार कतिपय शुभकामनाओं के आगे ‘अंग्रेजी' (नव वर्ष) जोड़कर यह संकेत दिए गए कि शुभकामनाएं तो ले लीजिए, लेकिन ज्यादा खुश मत होइए, क्योंकि ‘ये हमारा नव वर्ष नहीं है।’ और कुछ ने तो बाकायदा ‘हमारा नया साल तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से' तक के मैसेज प्रसारित किए। बीजेपी के तेज-तर्रार प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का बीजेपी मुख्यालय में इस तरह से नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए वह वीडियो भी खूब वायरल हुआ और किया गया कि ‘पोप ग्रेगरी 13वें द्वारा 1582 में करेक्टेड और अंग्रेजों द्वारा 1752 में अंगीकृत इस अंग्रेजी नववर्ष के प्रथम दिन की आप सभी को बधाई।'

ऐसे संदेशों और ऐसी भाषा के पीछे सांस्कृतिक उत्कर्ष की एक प्रबल आकांक्षा है, इससे इनकार नहीं। अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए और यह खूब बढ़े तथा निखरे, इसकी तमन्ना भी होनी चाहिए। लेकिन अंग्रेजी नव वर्ष को जिस तरह से एक धार्मिक संस्कृति से जोड़कर देखा गया और देखा जा रहा है, वह कितना उचित है, इस पर विचार करने की जरूरत है, ताकि इस कठिन आर्थिक दौर में देश किसी और राह पर ना निकल पड़े।

इस समय कथित राष्ट्रवादियों का एक तबका अंग्रेजी नव वर्ष को दबे-छिपे तौर पर धर्म विशेष से जोड़कर जरूर देख रहा है, लेकिन सच तो यह है कि इसका ज्यादा संबंध अर्थ से है, धर्म से नहीं। जिस दौर में ग्रेगेरियन कैलेंडर को सबसे पहले अपनाया गया, वह वो दौर था, जब ब्रिटेन की आर्थिक तरक्की व सियासी दबदबे का सूरज ऊपर चढ़ रहा था। 1600 से ब्रिटेन तरक्की की जिस राह पर आगे बढ़ा (बेशक इसमें ईस्ट इंडिया जैसी कंपनियों की औपनिवेशिक ब्लैक स्टोरीज भी शामिल हैं, मगर दबदबे का यह भी तो एक माध्यम था!), वह अठारवी सदी के उत्तरार्द्ध में वहां शुरू हुई पहली औद्योगिक क्रांति तक लगातार विस्तार पाती गई। यही वह समय था, जब दुनिया तेजी से ग्रेगेरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) को अपनाती गई।

कुछ ने बेहद ड्रैमेटिक अंदाज में अंग्रेजों को शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि ‘अच्छा हुआ, आप पधार गए। नहीं तो भारत के घर-घर हिजरी कैलेंडर होते।’ यह भी कैलेंडर पर धार्मिकता का चोला पहनाने का ही एक क्रिएटिव तरीका था, जबकि तथ्य यह है कि आज ईरान और अफगानिस्तान को छोड़कर दुनिया के तमाम बड़े व महत्वपूर्ण मुस्लिम देशों में भी धार्मिक के अलावा अन्य सभी गतिविधियां अंग्रेजी कैलेंडर द्वारा ही संचालित होती हैं। इनमें मुस्लिम जगत के प्रभावी मुल्क सऊदी अरब, यूएई से लेकर दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल राष्ट्र इंडोनेशिया भी शामिल है। वजह वही – आर्थिक, धार्मिक नहीं। अगर मुस्लिम देशों या कम्युनिटी का दुनिया में आर्थिक व सियासी दबदबा होता तो भारत तो क्या, ब्रिटेन में ही हिजरी संवत ही होता।

आज ब्रिटेन की वह आर्थिक हैसियत नहीं रही, लेकिन उसकी जगह अमेरिका ने ले ली है। वही अमेरिका जिसने भी 1752 में ब्रिटेन के साथ ही ग्रेगेरियन कैलेंडर को अपनाया था। आज उसका दबदबा है। वहां की एक सिलिकॉन वैली में मौजूद 6,500 कंपनियों में से केवल एक कंपनी एपल का ही बाजार मूल्य हाल ही में भारत की जीडीपी को पार कर गया है। आज अमेरिका भले ही कई मायनों में भ्रष्ट व पतित हो, लेकिन किसी के पास उसके आर्थिक राष्ट्रवाद का कोई तोड़ नहीं है।

सुधांशु जी जैसों से यह निवेदन तो बनता है कि वे हिंदुओं में सांस्कृतिक गर्व पैदा करने के साथ-साथ वैज्ञानिक व आर्थिक दृष्टिकोण भी पैदा करेंगे तो बेहतर रहेगा। वे लोगों को इनोवेशन, न्यू एज टेक्नोलॉजी में एक्सप्लोरेशन के लिए प्रेरित करें।और सबसे बड़ी बात, देश को भ्रष्ट सिस्टम से कैसे छुटकारा मिले, इसकी कोई राह अपनी सरकार को सुझाएं, क्योंकि इसके बगैर देश और संस्कृति का कल्याण नहीं हो सकता।

अगर हमने हमारे करप्ट सिस्टम को ठीक नहीं किया, न्यू एज इनोवेशन में काम नहीं किया, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं किया तो तय मानिए हमारी आने वाली अनेक पीड़ियों के घरों में भी बड़ी शान से अंग्रेजी कैलेंडर ही लटका मिलेगा; उन घरों में भी जो आज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ‘नव वर्ष’ को ताना मार रहे हैं।

# SudhanshuTrivedi #newyear #Gregorian_Calendar #JayjeetAklecha