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बुधवार, 20 मई 2026

गर्मी बहुत है? मगर इतनी भी नहीं कि यह हमारे चुनावों में राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन सके... !


By Jayjeet Aklecha
इस समय हर शहर, हर कस्बे, हर जगह, हर कोने से एक ही बात उठ रही है- गर्मी बहुत है...।
क्या वाकई बहुत है?
नहीं जी। अभी भी इतनी नहीं है कि हम बारिश की चंद बूंदों के बाद भी इसे याद रख सके...
इतनी भी नहीं है कि कटते पेड़ों की खबरें हमें एंग्जाइटी की हद तक बेचैन कर सके...
इतनी भी नहीं कि यह हमारे नेता लोगों को हमें सुरक्षित पर्यावरण की गारंटी देने के लिए मजबूर कर सके...
तो देखिए, अब भी गर्मी इतनी कहां है?
हमारी-आपकी कॉलोनी में जो जगह बगीचे के लिए रखी गई थी, वहां धर्म के नाम पर या किसी नेता की पार्किंग का कब्जा देखकर क्या हमें गुस्सा आता है?
नया मकान खरीदते हुए क्या हम अपने बिल्डर से यह पूछते हैं कि हरियाली के नाम पर सैकड़ों गैलन पानी पीने वाली कथित हरी घास और केवल ताड़ के पेड़ क्यों?
अगर हम किसान हैं तो कभी खुद से पूछते हैं कि अपने खेतों में दूर-दूर तक एक भी पेड़ क्यों नहीं? या कभी थे तो वे आज कहां हैं?
क्या बड़े-बड़े आर्किटैक्ट खुद से पूछते हैं कि ठंडे यूरोपीय देशों की नकल करने के फेर में वे यह कैसे भूल गए कि भारत जैसे गर्म देशों की इमारतों में इतने शीशों का क्या काम?
और बड़ा सवाल यह भी- हर छोटे-बड़े मसले पर तूफान खड़ा करने वाले हमारे राजनीतिक दल कहां हैं? कहीं नहीं हैं। इनकी प्राथमिकताओं में पर्यावरण सबसे आखिर में है। सत्तारूढ़ भाजपा के 2024 के घोषणा पत्र को देखें। इसने अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को पेज नंबर 67 पर जगह दी है, जो उसके घोषणा पत्र का समापन बिंदु है।
और भारत के लिए राष्ट्रीय संकट बन रहे इस मुद्दे पर विपक्ष कहां है? विपक्ष को छोड़िए। सरकार की छोटी-मोटी विफलताओं पर तुरंत ट्वीट करने वाले राहुल गांधी कहां हैं? इस मसले पर राहुल गांधी कहीं हो भी नहीं सकते, क्योकि स्वयं उनकी पार्टी के लिए भी पर्यावरण आखिरी प्राथमिकता है। भाजपा की तर्ज पर कांग्रेस ने भी अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को जगह दी है पेज 41 पर। यह उसका आखिरी अध्याय है।
और सबसे बड़ा सवाल हमारे मतदाताओं से भी- क्या हम गर्मी या पर्यावरण जैसे मसलों पर वोट देते हैं? नहीं। कोई किसी को वोट इसलिए देता है क्योंकि उसे धर्म खतरे में नजर आता है तो कोई सामाजिक न्याय के खतरे पर वोट देता है। धरती पर खतरा हमें केवल अप्रैल-मई में ही याद आता है और फिर उसे अगले साल तक के लिए मुल्तवी कर देते हैं।
तो सवाल यह है कि अभी हम क्या करें? मुझसे चार दिन पहले ही किसी ने पूछा था- गर्मी ज्यादा है? मैंने कहा, नहीं जी। इतनी भी नहीं कि हम इस गर्मी के मसले पर राष्ट्रव्यापी वोटिंग कर सके।
तो आइए, अभी तो हम 50-55 डिग्री तक का इंतजार करते हैं!!!

सोमवार, 18 मई 2026

हमारे नेताओं को 145 करोड़ लोग भी कम पड़ रहे हैं? इसलिए और बच्चे पैदा करने के लिए बांटी जाएंगी रेवड़ियां!

 

chandababu naidu birth rate

By Jayjeet Aklecha
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू उन कुछ चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जो पारंपरिक नेतागीरी वाली बिरादरी से थोड़े हटकर दिखाई देते हैं। पहनावे में भी और विजन को लेकर भी। उन्होंने दिखाया है कि धर्म और जाति की घृणित राजनीति के बीच भी इनोवेशन, नवाचार और विजन को राजनीतिक हथियार के तौर पर साधा जा सकता है। ऐसे में उनकी सरकार द्वारा दंपतियों को तीन और चार बच्चे पैदा करने पर प्रोत्साहन (पढ़ें प्रलोभन) देने वाली घोषणा बेहद निराशाजनक है।
इससे पहले आरएएस प्रमुख भी कई बार कह चुके हैं कि देश के हर परिवार को तीन बच्चे पैदा करना चाहिए। इन नेताओं की राजनीति के उकसावे में आकर अन्य नेतागण भी बच्चे पैदा करने के लिए रेवड़िया बांटने लगे तो क्या आश्चर्य?
नायडू की दलील है कि भविष्य में जनसंख्या का संतुलन बनाए रखने के लिए समाज को जन्म दर बढ़ाने की दिशा में काम करना होगा। बेशक, यह उन देशों के लिए जरूरी है, जहां पहले से ही बेहद कम आबादी है, जहां काम ज्यादा है, हाथ कम हैं। जहां सैकड़ों एकड़ जमीन पड़ी है, लेकिन उन्हें जोतने वाला कोई नहीं है। लेकिन भारत, खासकर आंध्रप्रदेश को लेकर उनकी चिंता की बुनियाद आधे-अधूरे सच पर खड़ी है।
अनुमानों के अनुसार भले ही भारत में जन्म दर घट रही है (और यह नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए हाल के वर्षों तक कठोर प्रयास किए गए हैं), लेकिन इसके बावजूद आबादी पर सबसे सटीक आकलन करने वाली संस्था यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन की ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024' की रिपोर्ट भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में इसी दर से घटती रफ्तार के बावजूद भारत की आबादी को स्थिर होने में अभी भी 35 से 40 साल लग जाएंगे और यह करीब 170 करोड़ के आसपास पहुंचकर स्थिर होगी। फिर वहां से धीरे-धीरे कम होनी शुरू होगी, बशर्ते मौजूदा जन्म दर में बढ़ोतरी न हो।
आज 145 करोड़ की आबादी में ही देश की सांसें फूल जाती हैं। एक बड़ी आबादी के पास काम नहीं है। एक बड़ी आबादी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो रही है। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज मुहैया करवाना पड़ रहा है। ऐसे में मौजूदा जन्मदर के हिसाब से जब हम 170 करोड़ पर पहुंच जाएंगे तब क्या होगा? और अगर हमारे लोग ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले प्रलोभन में आ गए, तब?
नायडू अपने फैसले के समर्थन में दक्षिण कोरिया जैसे देशों का हवाला देते हैं, जहां की आबादी तेजी से घट रही है। तथ्य यह है कि अकेले आंध्र की आबादी पूरे दक्षिण कोरिया देश की आबादी से ज्यादा है। नायडू को पता होगा कि उनकी राज्य की आबादी को भी स्थिर होने में कम से कम 10 से 15 वर्ष लग जाएंगे। इस अवधि के बाद भी अकेले आंध्र प्रदेश की आबादी 6 करोड़ से ज्यादा ही होगी। प्रति व्यक्ति आय,जीवनशैली और कई तरह की सुविधाओं को लेकर दक्षिण कोरिया केवल आंध्र प्रदेश ही नहीं, पूरे भारत से आगे है। तो पहले कोशिश वह देने की होनी जानी चाहिए जो ये विकसित देश दे चुके हैं- अपने लोगों को बेहतर जीवनशैली।
इसलिए हमारे नेताओं से करबद्ध आग्रह है कि इस तरह की बेतुकी बात करने या फैसले लेने से पहले काम करने के इच्छुक हर व्यक्ति को काम मिल सके, यह सुनिश्चित कीजिए। लगातार बढ़ती गर्मी के बीच हर परिवार को कूलर के लिए पानी तो छोड़िए, उसे शुद्ध पेयजल नसीब हो सके, यह सुनिश्चित कीजिए। एक झटके में ही एक शहर में गंदे पानी से 30-35 लोग मर जाते हैं और नेता लोग घंटा बजाते हुए चल देते हैं। देश के करोड़ों लोगों को बहुत सी बुनियादी चीजें मुहैया करवाना बाकी है। पहले वह करवाइए, फिर जन्म दर की चिंता कीजिए।
फिर एक सवाल और भी है, जो कहीं ज्यादा विचारणीय है। आखिर ये बच्चे पैदा कौन करेगा? एक स्त्री ही ना? मतलब, बस वह अपनी देह को कुर्बान करे, ताकि हमारा समाज या हमारा देश चलता रहे! बल्कि, हकीकत में आपकी राजनीति चलती रहे। बेशक, मां बनना एक विशिष्ट आत्मीय गौरव की बात होती है (जिसका वर्णन शायद स्त्री ही कर सके)। लेकिन आर्थिक प्रलोभन देकर उसे बच्चे जनने की मशीन बनाना एक बिल्कुल अलग बात है, अमानवीयता के बेहद करीब।
तो जब कोई नेता तीन या चार बच्चे पैदा करने का प्रलोभन या ज्ञान दें, तो उससे यह सवाल भी पूछना बनता है कि आखिर ये पैदा कहां से होंगे? ये सवाल कम से कम देश की स्त्रियों को तो अवश्य करने चाहिए।

मंगलवार, 12 मई 2026

फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम... एक अच्छी रेवड़ी!!! क्या हमारी सरकारों को इस पर सोचने का वक्त मिलेगा?


public transport india
By Jayjeet Aklecha
हमारे कर्णधार कभी-कभी बड़ी खूबसूरत बातें कह देते हैं। वे कह रहे हैं - कुएं खोदिए। पानी के लिए। अच्छा आइडिया है। मगर सवाल यह है कि आग लग चुकी है तो अब कुएं खोदने से कितना फर्क पड़ेगा?
जब वे कहते हैं कि हमें पब्लिक टांसपोर्ट से चलना चाहिए तो मैं कहता हूं- हां, मैं चलने को तैयार हूं, मगर इसका सिस्टम है कहां? और यह मैं मप्र की राजधानी भोपाल में बैठकर पूछ रहा हूं, किसी छोटे-मोटे शहर से नहीं। यह वही राजधानी है, जहां वर्षों से डबल इंजन ही नहीं, ट्रिपल इंजन सरकारें रही हैं। भारी-भरकम बजट वाली नगर सरकार पर भी समान विचारधारा वालों का आधिपत्य रहा है।
भोपाल में करीब 7 साल पहले मेट्रो प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। कहां तक पहुंचा? 7 साल में 7 किमी। इस बीच, बसों का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम खत्म हो गया। कुछ अफसर कुछ साल पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टमों का अध्ययन करने विदेश यात्राओं पर गए थे। लौटे तो भोपाल और इंदौर में करोड़ों रुपए में बीआरटीएस बनाए गए। मगर कुछ साल में इन्हें खत्म कर दिया गया। खत्म करने में करोड़ों और खत्म हुए। हमारे नेताओं और अफसरों की प्रायोरिटी में ये करोड़ों रुपए है, कोई सिस्टम नहीं।
ये पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम अच्छे थे या बुरे, यह अलग बहस का विषय हो सकता है, लेकिन कड़वा सच यही है कि सत्ता में बैठे लोगों में यह क्लेरिटी ही नहीं है कि उन्हें करना क्या है? और यह सिर्फ आज की सरकारों पर सवालिया निशान नहीं है। हर सरकार हमेशा भगवान भरोसे ही रही है। आज की सरकारें जरा ज्यादा हैं, क्योंकि यही 'भगवान' इन्हें वोट भी दिलाते हैं।
हमारे यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर हर शहर में बस मेट्रो का शिगूफा छोड़ा जा रहा है। लेकिन ढंग की बसें तक नहीं हैं। उनकी टाइमिंग, शहर के लगभग हर इलाके तक कनेक्टिविटी, अर्ली मॉर्निंग टु लेट नाइट तक उनकी सर्विस, यह सब तो बाद की बातें हैं।
कुछ देशों ने अपने यहां के बड़े शहरों में टेक ड्रिवन सुगम और फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम से न केवल परिवेश को ठीक किया है, बल्कि भारी मात्रा में वो डॉलर भी बचाए हैं, जिनकी चिंता अब हमारे कर्णधारों को हो रही है।
सुविधाजनक और फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट एक अच्छी रेवड़ी हो सकती है। यह वोट भी दिला सकती है और निश्चित ही देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा तो बचाएगी ही। लेकिन यह बात तब समझ में आएगी, जब केंद्र में बैठे कर्णधार हर चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ना बंद कर देंगे। जब किसी राज्य के चुनाव को महज चुनाव की तरह लेंगे, किसी भी तरह जीतने की जिद की तरह नहीं। तब सोचने के लिए समय होगा, तब कुछ लॉन्ग टर्म विजन सामने आएंगे।
(तस्वीर: भोपाल में यदा-कदा दिखाई देने वाली पब्लिक ट्रांसपोर्ट की एक बस, जिसमें ऐसे दृश्य आम हैं।)

शनिवार, 28 मार्च 2026

कूटनीति बच्चों का खेल नहीं, मगर कभी-कभी बड़ों की गलतियों को बच्चे भी संभाल लेते हैं!!

By Jayjeet

दायीं तरफ की तस्वीर भारत स्थित ईरानी दूतावास ने जारी की है। भारत सरकार की शुरुआती कूटनीतिक गलती को उन लोगों ने, खासकर उन बच्चों ने ढक लिया, जिन्होंने महज अपने धर्मगुरु की हत्या के विरोध में ईरान की सहायता करने की कोशिश की थी। लेकिन इस कवायद का कितना व्यापक असर हुआ, इसका अनुमान इस तस्वीर को देखकर लगाया जा सकता है। ईरानी दूतावास ने इस तस्वीर को जारी करते हुए लिखा - 'हम आपकी दयालुता कभी नहीं भूलेंगे।'
ये उसी कौम के बच्चे हैं, जिन्हें देशभक्ति के ठेकेदार अक्सर संदेह की नजरों से देखते हैं। ये ज्यादातर उसी राज्य के बच्चे हैं, जहां की जमीन को तो ये ठेकेकार भारत का अभिन्न अंग मानते हैं, जो है भी, मगर अक्सर वहां के रहवासियों को नहीं।
आज अगर भारत लॉकडाउन लगाने की नौबत से बचा हुआ है तो इसकी एक वजह ईरान की यह इमोशनल जियोपोलिटिक्स भी है, जिसके तहत उसने भारतीय नागरिकों व बच्चों की उसके प्रति उदारता को सिर माथे लेकर होर्मुज से जहाजों को निकलने की अनुमति दी है (बेशक, यह अकेली वजह नहीं है)। इसने यह भी दर्शाया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े फैसलों में मजहब और घरेलू राजनीति को किनारे पर रखा जाता है। ईरान ने जिन चुनिंदा देशों के जहाजों को निकलने की अनुमति दी है, उनमें से तीन (भारत, चीन और रूस) इस्लामिक देश नहीं हैं।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान पर अमेरिकी हमले और खामनेई की मौत के बाद छह दिन तक भारत सरकार द्वारा चुप्पी साधे रखने की एक वजह देश की घरेलू राजनीति भी रही। हो सकता है, यह बात पूरी तरह सच न हो, मगर हर जगह धर्म के साथ फ्रंटफुट पर खेलने वाले हमारे कर्णधारों पर लगने वाले ऐसे आरोप से इनकार करते भी नहीं बनता है।
उम्मीद है, आज संकट में देश से 'टीम इंडिया' की तरह बर्ताव करने का आह्वान करने वाले और उनके सपोर्टर इन बच्चों के योगदान को संकट के बाद भी उसी तरह याद रखेंगे, जैसा याद रखने का वादा ईरान ने किया है।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

यह खारिज करने की शुरुआत है... यकिन मानिए, अंत भी अच्छा ही होगा!!!



By Jayjeet

यह वीडियो देखिए। कहां का है, कब का है, पता नहीं, मगर जो भी है, अच्छा है। सवाल यह है कि क्या बजरंग गैंग अपने इन कथित बजरंगियों को सस्पेंड करेगा? कर भी देना चाहिए। इस गैंग को ऐसे सीधे-सादे बच्चों की जरूरत नहीं, जिन्हें डंडे लेकर ढंग से धमकाना भी न आता हो...!!
खैर, मजाक के इतर, यह वीडियो तो बहुत ही छोटा-सा है, मगर इसमें एक बड़ा आशाजनक संदेश है... धर्मोंन्माद लंबा नहीं चलता। नई पीढ़ी अंतत: धर्मोन्माद को खारिज करेगी, और यह दुनियाभर में होगा। बांग्लादेश जैसे इस्लामिक मुल्क ने भी कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के बजाय अपेक्षाकृत उस उदार व युवा को कमान सौंप दी है, जिसका स्टाइल स्टेटमेंट क्लीन शेव और ब्लू ब्लेजर है। ईरान में अंदर ही अंदर अंसतोष खदबदा रहा है, जो एक न एक दिन फूटेगा ही। महिलाओं को जूती समझने वाले तालिबानी भी आखिर कब तक खैर मनाएंगे!
हमारे यहां अभी हो सकता है, हिमंता और धामी जैसे लोग कुछ चुनाव और जीत जाए। जीतने दीजिए। मगर समय आएगा जब उनके ही उन्हें खारिज करेंगे, वैसे ही कोटद्वार का दीपक, जिसने एक कथित हिंदुवादी संगठन की गुंडागर्दी से एक बुजुर्ग को बचाया। और जैसे उक्त वीडियो में हिंदू युवाओं ने ही गैंग की दादागीरी को खारिज किया।
देश ने 2047 तक विकसित देश बनने का संकल्प लिया है। ध्यान रखना होगा कि विकास और धर्म साथ-साथ नहीं चल सकते, कम से कम धर्मोन्माद तो बिल्कुल भी नहीं। अमेरिका और यूरोप में विकास ने तब गति पकड़ी, जब चर्च खाली होने लगे, पादरियों से मोहभंग होने लगा और विज्ञान का परचम लहराने लगा।
हमारे यहां भी धर्मोन्माद का यह उन्माद क्षणिक है। आज नहीं तो कल भगवा दुपट्टे हटेंगे, सफेद टोपियां विश्राम करेंगी और विज्ञान का झंडा ही बुलंद होगा। आखिर, धर्मोन्माद के साइड इफेक्ट्स के मुकाबले विज्ञान के साइड इफेक्ट्स से निपटना ज्यादा आसान रहेगा।

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

बहस पर बहस करने वाले बस जावेद साहब की आखिरी लाइन पर गौर करें...!

By Jayjeet


दो दिन पहले लल्लनटॉप पर ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व को लेकर जावेद अख्तर और मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच हुई बहस के बाद कई तरह की बहसें हो रही हैं। ईश्वर एक ऐसा विषय है, जिस पर अंतहीन बहस हो सकती है। लेकिन करीब दो घंटे की इस बहस में सबसे अच्छी बात मुझे वह लगी, जो जावेद साहब ने सबसे अंत में कही। शायद पूरी बहस देखने के बाद भी अधिकांश लोगों को इल्म नहीं होगा कि वे आखिर में सबसे खूबसूरत बात क्या कह गए... इसकी चर्चा आगे...

रवीश कुमार सहित कई लोगों ने आशंका जताई है कि इस बहस ने देश में साम्प्रदायिकता के प्रसार के लिए लोगों को नया मसाला दे दिया है। इस समय भयंकर ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहे इस देश में यह दिक्कत तो है कि ऐसी सार्थक बहसों के साथ भी ऐसी आशंकाएं चिपक जा रही हैं। फिर भी, धार्मिक ध्रुवीकरण तो किसी एक इलेक्शन या किसी लल्लू-पल्लू नेता के भाषण से भी हो जाता है। तो बहस से ही सही...

एक विडंबना यह भी कि इस बहस को कई लोग हार-जीत के तौर पर देख रहे हैं। यह बहस एक नास्तिक और एक आस्तिक (बिलिवर) के बीच थी। मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी केवल ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व के समर्थक के तौर पर प्रतिनिधि भर थे। उनकी जगह कोई हिंदू पंडित या ईसाई पादरी भी हो सकता था। इसलिए उन्हें इस्लाम का प्रतिनिधि मानने के बजाय तमाम 'आस्तिकों' का प्रतिनिधि मानना चाहिए, जिनकी ईश्वर के आस्था है। इसलिए बहस किसी धर्म के खिलाफ या धर्म के समर्थन में नहीं कही जा सकती। लेकिन दुर्भाग्य से जहां एक तबका इसे मुस्लिम धर्म की विजय बता रहा है, तो वहीं दूसरा तबका जावेद अख्तर के साथ केवल इसलिए खड़ा नजर आ रहा है, क्योंकि वे एक मौलवी के तर्कों का जवाब दे रहे थे (इनमें अधिकांश लोग वे भी हो तो आश्चर्य नहीं, जो जावेद साहब को गाहे-बगाहे पाकिस्तान जाने का हुक्म सुनाते रहते हैं)।

तमाम साम्प्रदायिक समस्याओं के बावजूद देश इस तरह के विषयों पर बहस करने लगा है, यह सबसे सकारात्मक लक्षण है। जैसा कि जावेद साहब ने कहा कि क्या यह बहस आज से सौ साल पहले हो सकती थी? एक व्यक्ति ईश्वर/खुदा पर सवाल उठाए, क्या यह सोचा जा सकता था? मुस्लिम सम्प्रदाय की परिभाषा में जावेद साहब की कई बातों को एक 'काफिर' द्वारा की गई ईशनिंदा मानकर उनके खिलाफ फतवे जारी किए जा सकते हैं। अच्छी बात है कि अब तक ऐसे किसी फतवे के जारी होने की कोई खबर नहीं है और उम्मीद है कि ऐसा होगा भी नहीं। यह बड़ी बात है और यह उसी बदलाव का संकेत है, जिसकी जावेद साहब भविष्य में उम्मीद रखते हैं।

खुदा/ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, इस विचार को किसी पर थोपा नहीं जा सकता। सभी को लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे इसे मानें या न मानें। लेकिन जावेद साहब ने इसके जरिए तमाम धर्मों की प्रासंगिकता पर सवाल जरूर उठाए हैं और इस पर आगे भी बहस होनी चाहिए। बहस होनी चाहिए कि आखिर अगर मजहब केवल लड़ना सिखाएं तो हमें ये धर्म या मजहब क्यों चाहिए?

अंत में वही बात, जिसके लिए मुझे इतना सबकुछ लिखना पड़ा। जावेद साहब ने चलते-चलते कहा- 'बहस के बाद अब मैं इन मौलवी साहब के साथ खाना खाने वाला हूं' ... यही सबसे अच्छी और खूबसूरत बात थी। इस सामान्य से वाक्य के भी संकेत गहरे हैं : असहमति में भी इतनी गुंजाइश होनी चाहिए कि साथ खाना खाया जा सके, आगे की चर्चा की जा सके, हम कुछ दूसरों से ग्रहण कर सके, कोई दूसरा हमसे ग्रहण कर सके... और यह बात हर क्षेत्र में लागू होनी चाहिए - असहमतियों का सह-अस्तित्व।

तो, अगर आप अपनी-अपनी वजहों से दोनों वक्ताओं का समर्थन कर रहे हैं तो कृपया इनसे इस बात की सीख भी जरूर लीजिए।

#Javedakhtar #javedakhtarvsmuftishamail

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

नदियों के सत्यानाश के लिए और 20 करोड़ लोग क्यों चाहिए?

By Jayjeet
दुनिया की 10 शीर्ष स्वच्छ नदियों में से सारी की सारी उन देशों में हैं, जहां नदियों की पूजा नहीं की जाती। भारत की कभी सर्वाधिक स्वच्छ नदी मानी जाने वाली उमंगोट भी अब इस सूची से बाहर हो चुकी है।
आज अचानक से नदियों का जिक्र इसलिए क्योंकि कल ही संघ के एक विद्वान नेता दत्तात्रेय होसबले ने बड़ी मासूमियत से पूछा था कि अगर मुस्लिम लोग नदी की पूजा करें तो क्या हर्ज है?
इन दिनों दूसरों के गिरेबान में झांकने का शौक कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। पूजा के नाम पर हम हिंदू लोग नदियों का कितना सत्यानाश कर रहे हैं, इसकी चिंता करने या इस पर कोई सकारात्मक विमर्श शुरू करने के बजाय हमें फिक्र इस बात की ज्यादा हो रही है कि विधर्मी लोग नदियों की पूजा क्यों नहीं कर रहे? यह उतना ही बड़ा पाखंड है, जितना कि भ्रष्टाचार में पगे लोग वंदे मातरम गाते हुए न गाने वालों को पाकिस्तान भेजने की धमकी देते हैं।
हाल ही में एक खबर आई थी कि केदरानाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालु लोग अपने आराध्य स्थल पर इतना कचरा छोड़ आए कि उसे नीचे लाने में सरकार को करोड़ों खर्च करने होंगे। यह विडंबना नहीं कि हम उन्हीं चीजों का सत्यानाश करने पर तूले रहते हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं? और ऊपर से हम चाहते हैं कि इस इकोसिस्टम में 10-20 करोड़ लोगों का भार और आ जाए? इसी संदर्भ में एक प्रसंग का उल्लेख समीचीन है। हमारे एक मित्र जापान गए थे। वहां एक मंदिर में बहुत ढूंढने पर उन्हें बड़ी मुश्किल से एक डस्टबिन मिला। पता चला कि जापानी तो अपना कचरा वापस साथ ले जाते हैं। हमारे जैसे भारतीयों के लिए ही शायद एक-आध डस्टबिन लगाया गया था। जापान भी आस्थावान देश है। लेकिन दो आस्थावान देशों के नागरिकों में भी कितना अंतर है? और क्यों है? लोहिया जी के शब्दों में, दुनिया में सर्वाधिक ढोंगी कोई कौम है तो वह भारतीय है।
होसबले यहीं नहीं रुके। (जैसा कि अखबारों में छपा है), उन्होंने कहा, 'मुस्लिमों को पर्यावरण संरक्षण के लिए नदियों, पेड़ों और सूर्य का सम्मान करने से कोई नुकसान नहीं होगा।'
मैं इससे सहमत हूं। लेकिन सम्मान करने की बात पहले अपने घर के लोगों से कहिए। हिंदुओं से कहिए कि पूजा के बाद अपना कचरा मां गंगा या मां नर्मदा के हवाले करने के बजाय साथ ले जाएं और अगर एक भी पेड़ कटे तो उसके लिए उतना ही हंगामा करने के लिए तैयार रहें, जितना की गौ-रक्षा के नाम पर करते हैं। आखिर देश में करीब एक बिलियन लोग हिंदू हैं। पर्यावरण और पेड़ों को बचाने के लिए इन्हें और 20 करोड़ों लोगों की क्या जरूरत? वैसे भी सनातनी परंपरा में तो मंदिरों से भी पहले पेड़ों की पूजा की जाती थी? तो अगर हम वाकई सनातनी हैं तो स्वयं अपने कर्तव्य को पूरा करें, फिर दूसरों को ज्ञान दें।
पुनश्च... हाल ही में दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी टेम्स में पैर धोते एक युवक का वीडियो वायरल हुआ था। बताने की जरूरत नहीं कि वह भारतीय मूल का युवक था। लदंन प्रशासन ने युवक पर जुर्माना लगाकर भविष्य में ऐसा न करने के प्रति सख्ती से आगाह किया था। तो नदियों की पूजा ऐसे भी तो की जा सकती है?

रविवार, 29 जून 2025

(Indian Shubhnshu Shukla in ISS) क्या कभी अंतरिक्ष भारत के लिए 'न्यू नॉर्मल' बन सकेगा?

By Jayjeet

बेशक, छोटी-छोटी उपलब्धियों पर हमें खुश होना चाहिए, गर्व करना चाहिए। लेकिन जब मामला देश का हो तो गर्व के साथ-साथ हमें चिंतन भी करना चाहिए।
41 साल बाद कोई भारतीय अंतरिक्ष में पहुंचा है। तो आइए, खुशी के साथ-साथ एक गंभीर विमर्श भी करें। यह धर्म, जाति, सम्प्रदाय के मुद्दों पर सत्ता पर काबिज होने वाली सरकारों के समक्ष सवाल उठाने का भी बेहतरीन मौका है। बड़ा सवाल यही है- दो अंतरिक्ष यात्रियों के बीच चार दशक का समय कैसे लग गया?
हम कितने सफल हैं या हम कितने पीछे हैं, इसका कोई तो पैमाना होना चाहिए। हमें चीन को इस पैमाने के तौर पर सामने रखना चाहिए, क्योंकि वह हमारा स्वाभाविक प्रतिद्वंद्वी भी है। अमेरिका से तुलना बेमानी होगी।
चीन के साथ भी तुलना करते समय हमें उसके क्षेत्रफल और वहां की अपेक्षाकृत स्थाई सरकारों के परिदृश्य को ध्यान में रखना होगा। इसलिए उसकी तुलना में हर क्षेत्र में भारत की तीन से पांच गुना तक की कमी को जायज मानना चाहिए। तो भारत के 2 अंतरिक्ष यात्रियों की तुलना में चीन के 8 से 10 अंतरिक्ष यात्रियों का आंकड़ा होता तो मान सकते थे कि हम पीछे कतई नहीं हैं।
लेकिन जब हम अंतरिक्ष में चीन के मिशनों को एक्सप्लोर करते हैं तो पता चलता है कि हम जमीन पर है और चीन आसमान में। वैसे तो चीन के कितने ही स्पेस मिशन हैं, लेकिन हम केवल अंतरिक्ष यात्रियों की ही बात कर लें, तब भी यह अंतर हमसे कहता है कि असल इतिहास रचने के लिए हमें लंबा सफर तय करना बाकी है।
चीन ने अपने मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की शुरुआत 2003 में की थी। इस लिहाज से तो वह भारत से पिछड़ा हुआ ही माना जाएगा! भारत के राकेश शर्मा तो 1984 में ही अंतरिक्ष की तफरीह कर आए थे, मगर रूसी अंतरिक्ष मिशन के साथ। अब शुभांशु शुक्ला पूरे 41 साल बाद अंतरिक्ष में गए हैं, अमेरिकी मिशन के साथ।
इस दौरान चीन ने क्या किया? उसने अपने स्वदेशी मिशन ‘शेनझोउ' पर काम किया। बीते 22 साल में ही वह 26 अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेज चुका है। सारे के सारे उसके स्वदेशी अंतरिक्ष यान ‘शेनझोउ' से गए हैं।
हमें ज्यादातर खबरें इंटरनेशनल अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की ही पढ़ने को मिलती हैं। शुभांशु भी वहीं गए हैं। लेकिन चीन का अपना अंतरिक्ष स्टेशन हैं - तियांगोंग स्पेस स्टेशन। ISS की तरह यह भी अंतरिक्ष में एक स्थाई स्टेशन है। उसके सारे यात्री वहीं जाते हैं, वहीं रहते हैं और वहीं प्रयोग करते हैं। वहां जाना अब चीन का ‘ओल्ड नॉर्मल' बन चुका है।
41 साल के सफर की यह पूरी कहानी देश को शर्मिंदा करने के लिए नहीं है। देश कभी शर्मिंदा नहीं होता। मगर हमारे महान देश के कर्णधारों को इस पर विचार करने के लिए काफी होनी चाहिए, जो अब भी धर्म और जाति को लेकर देश को हलाकान किए रहते हैं।