शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

चीनी डॉग पर हंगामा और प्रधानमंत्री का इंटरव्यू... हमारे 'टैलेंट' को इस एंगल से भी समझें!!!

Galgotias University dispute in AI impact summit

 By Jayjeet Aklecha

इन दिनों एक यूनिवर्सिटी के उस चीनी रोबोटिक डॉग को लेकर अच्छा हंगामा बरपा हुआ है, जिसे उसने कथित तौर पर अपना एआई इनोवेशन बताया था। लेकिन इस घटना के चार दिन पहले जो घटित हुआ, जरा उसकी चर्चा कर लेते हैं।
16 फरवरी को प्रधानमंत्री का पीटीआई को दिया एक इंटरव्यू जारी हुआ। इसमें उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरर बन गया है। इस दावे पर कोई सवाल नहीं है। न ही इस बहस में पड़ना उचित है कि स्मार्टफोन के हम वाकई मैन्युफैक्चरर हैं या असेम्बलर।
लेकिन उस यूनिवर्सिटी के एक दावे पर चली फिकरेबाजी के बीच मेरा छोटा-सा सवाल है- हम जो खुद को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा 'स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरर' बता रहे हैं, वे स्मार्टफोन आखिर किन देशों के हैं?
हमने एआई समिट में तो बड़ी-बड़ी बातें की हैं, लेकिन हम आज तक उस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए अपना कोई ऐसा स्मार्टफोन क्रिएट क्यों नहीं कर पाए, जो बहुत आम है? इस टेक्नोलॉजी पर चीन हर चौथे महीने एक नया फोन ले आता है और जिसकी मैन्युफैक्चरिंग/असेंबलिंग करते हुए हम बड़े गौरवान्वित होते हैं।
एपल को क्रिएट करने की कोशिश मत कीजिए, लेकिन क्या मोटोराला या रेडमी या ओप्पो जैसा कोई अपना फोन नहीं हो सकता? हम इन तमाम कंपनियों के फोन अपने यहां मैन्युफैक्चर या असेंबल करके निर्यात करते हैं और प्रधानमंत्रीजी इस पर अपनी पीठ थपथपाते हैं। बेशक, इससे भी देश को खूब कमाई होती है। जॉब्स मिलते हैं। यह भी देश हित में है, इससे इनकार नहीं है। लेकिन अगर हमारा अपना फोन होगा तो सोचिए, यह कमाई कितनी बढ़ जाएगी? कितने उच्च वेतनमान वाले जॉब्स यहां बनेंगे? वह मेक बाय इंडिया भी होगा और मेक इन इंडिया भी।
मुझे नहीं लगता कि इस पर न तो कभी प्रधानमंत्री ने कभी कुछ कहा होगा और न गलगोटिया यूनिवर्सिटी का मजाक उड़ाने वालों ने कुछ पूछा होगा। पीटीआई के सवाल पर जब प्रधानमंत्री कहते हैं – ‘In fact, globally celebrated phone brands are being produced in India' तो मन में सवाल उठता है कि हमारे प्रधानमंत्री यह कब कहेंगे - “In fact, India not only has globally celebrated brands, but we are also manufacturing them for the world.”
मेरी उस यूनिवर्सिटी के साथ कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन जिस चीनी तकनीकी को लेकर यह बखेड़ा खड़ा हुआ है, उस परिदृश्य को भी समझना जरूरी है। चीन अपने आप में कोई विशेष इनोवेटर नहीं है। उससे खासकर अमेरिकी और यूरोपीय पैटेंट धारक तो इस वजह से बहुत नाराज रहते हैं कि वह उनकी टेक्नोलॉजी की नकल इस तरह अकल से करता है कि वह चीन की अपनी तकनीक लगती है। एआई को लेकर हम बातें प्रोड्यूस करने के अलावा बहुत कुछ इनोवेटिव प्रोड्यूस करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि इसके लिए अरबों के निवेश की जरूरत है। तो क्या तब तक हमारी यूनिवर्सिटीज और हमारे आईआईटीज कम से कम जो तकनीक उपलब्ध है, उस पर काम करते हुए कुछ बेहतर प्रोड्यूस कर सकते हैं?
किसी की नकल करना इतना खराब भी नहीं है और न इसमें दुनिया के आगे हमारी नाक कटी है। जो यह कह रहा है, उसे दरअसल, साइंस या इनोवेशन की प्रोसेस के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है। हर टेक कंपनी या रिसर्चर या देश इसी तरह से आगे बढ़ता है, बशर्ते वह ऐसा करते-करते बाद में उसे इनोवशन में भी बदल देना जानता हो। सच तो यह है कि विज्ञान किसी की बपौती नहीं होती है। उसे देखकर, समझकर, कुछ अनुसरण करके, ढेर सारी गलतियां करके और कभी-कभी कुछ कॉपी करके आगे बढ़ा जाता है। हां, नकल में बहुत सारी अपनी अकल भी लगानी होती है, जो उस यूनिवर्सिटी को लगानी चाहिए थी। अब भी लगा सकती है। विज्ञान की यही खूबी है कि इसमें रास्ते कभी बंद नहीं होते।
पुनश्च... कांग्रेस और राहुल गांधी इस मसले को लेकर भी बहुत उत्साहित नजर आए। वे हर मसले पर जरा ज्यादा ही उत्साहित हो जाते हैं। क्या उन्हें जनरल नरवणे की किताब वाले असल चाइनीज इश्यू से भटकने की जरूरत है?

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

यह खारिज करने की शुरुआत है... यकिन मानिए, अंत भी अच्छा ही होगा!!!



By Jayjeet

यह वीडियो देखिए। कहां का है, कब का है, पता नहीं, मगर जो भी है, अच्छा है। सवाल यह है कि क्या बजरंग गैंग अपने इन कथित बजरंगियों को सस्पेंड करेगा? कर भी देना चाहिए। इस गैंग को ऐसे सीधे-सादे बच्चों की जरूरत नहीं, जिन्हें डंडे लेकर ढंग से धमकाना भी न आता हो...!!
खैर, मजाक के इतर, यह वीडियो तो बहुत ही छोटा-सा है, मगर इसमें एक बड़ा आशाजनक संदेश है... धर्मोंन्माद लंबा नहीं चलता। नई पीढ़ी अंतत: धर्मोन्माद को खारिज करेगी, और यह दुनियाभर में होगा। बांग्लादेश जैसे इस्लामिक मुल्क ने भी कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के बजाय अपेक्षाकृत उस उदार व युवा को कमान सौंप दी है, जिसका स्टाइल स्टेटमेंट क्लीन शेव और ब्लू ब्लेजर है। ईरान में अंदर ही अंदर अंसतोष खदबदा रहा है, जो एक न एक दिन फूटेगा ही। महिलाओं को जूती समझने वाले तालिबानी भी आखिर कब तक खैर मनाएंगे!
हमारे यहां अभी हो सकता है, हिमंता और धामी जैसे लोग कुछ चुनाव और जीत जाए। जीतने दीजिए। मगर समय आएगा जब उनके ही उन्हें खारिज करेंगे, वैसे ही कोटद्वार का दीपक, जिसने एक कथित हिंदुवादी संगठन की गुंडागर्दी से एक बुजुर्ग को बचाया। और जैसे उक्त वीडियो में हिंदू युवाओं ने ही गैंग की दादागीरी को खारिज किया।
देश ने 2047 तक विकसित देश बनने का संकल्प लिया है। ध्यान रखना होगा कि विकास और धर्म साथ-साथ नहीं चल सकते, कम से कम धर्मोन्माद तो बिल्कुल भी नहीं। अमेरिका और यूरोप में विकास ने तब गति पकड़ी, जब चर्च खाली होने लगे, पादरियों से मोहभंग होने लगा और विज्ञान का परचम लहराने लगा।
हमारे यहां भी धर्मोन्माद का यह उन्माद क्षणिक है। आज नहीं तो कल भगवा दुपट्टे हटेंगे, सफेद टोपियां विश्राम करेंगी और विज्ञान का झंडा ही बुलंद होगा। आखिर, धर्मोन्माद के साइड इफेक्ट्स के मुकाबले विज्ञान के साइड इफेक्ट्स से निपटना ज्यादा आसान रहेगा।

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

(Aravali) आदमी और पहाड़

By Jayjeet 

भोली सूरत वाला वह आदमी पहाड़ के नीच आकर खड़ा हो गया।

पहाड़ भी भोला-भाला। आदमी की तरह केवल सूरत से नहीं, सीरत से भी।

उस भोली सूरत वाले आदमी ने पहाड़ को दद्दू कहकर पुकारा तो पहाड़ स्नेह से भर उठा।

पहाड़ को लगा कि यह आदमी उसके साथ कुछ सुकून के पल बिताने आया होगा। कुछ दिन बंशी बजाएगा और चला जाएगा। लेकिन पहाड़ को पता नहीं कि आदमी के भीतर की अशांति इतनी बढ़ गई है कि पहाड़ के साथ कुछ पल बिताना ही काफी नहीं है। अब वह पूरे पहाड़ को ही अपने में बिताना चाहता है।

‘कैसे आए हो बेटा? तुम आज ज्यादा ही चिंतित दिख रहे हो?’

‘हां, दद्दू बहुत बेचैन हूं, चिंता खाए जा रही है,’ भोले आदमी ने और भी ऊपरी भोलेपन से कहा।

 ‘बेटा, यह पूरा पहाड़ तुम्हारा है, तुम्हारे लिए है, तुम्हारे बच्चों के लिए है। मेरी गोद में आओ और सबकुछ भूल जाओ।’

पहाड़ कितना भी अनुभवी क्यों न हो, पर मन से वह भोला ही है, इतना भोला कि वह आदमी के ऊपरी भोलेपन को ताड़ नहीं पाया। अपने भीतरी कमीनेपन को भोलेपन से किस तरह छुपाया जा सकता है, मार्केटिंग गुरुओं की साेबत में आदमी यह सीख गया है।

आदमी ने अपने दुखियारे चेहरे पर मासूमियत का मुल्लमा लगाते हुए कहा, ‘दद्दू, मैं आपके साथ समय बिताने नहीं आया हूं। मैं इस समय सबसे बड़े मसले विकास को लेकर चिंतित हो रहा हूं।’

‘विकास?’ पहाड़ को अचानक से कुछ समझ में नहीं आया। आखिर भोले आदमी ने भी तो अचानक से विकास की चर्चा छेड़ दी थी।

आदमी ने अपने कमीनेपन पर भोलेपन की परत गहरी करते हुए कहा, ‘देखो, दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है। मैं चाहता हूं कि हम भी विकास करें, आप भी विकास करें। इसमें आपका भी साथ चाहिए। सबका साथ सबका विकास से ही तो हम आगे बढ़ेंगे।’

पकाड़ ने विकास का नाम तो सुन रखा है, पर इस शब्द का असल मतलब नहीं जानता। आखिर, लाखों साल पुरानी परवरिश है। कैसे जान सकता है?

पहाड़ ने कहा, ‘बच्चे, विकास मतलब कहीं वही तो नहीं? पेड़ों को काट देना, नदियों की धाराएं मोड़ देना। मैंने सुना है, अब तो मेरे जैसे कुछ पहाड़ भी खोद दिए गए हैं!’

भोली सूरत वाला आदमी चौंक गया। उसने पहाड़ को वाकई भोला ही समझा था, मगर वह उसकी उम्मीदों से थोड़ा कम भोला निकला।

भोले आदमी ने तुरंत गियर बदला। ‘नहीं नहीं। आप भी कहां विकास विरोधी लोगों के झांसे में आ गए। हमने पेड़ काटे तो लगाए भी हैं। खूबसूरत कॉलोनियों में ताड़ के लगाए पेड़, हाईवे के किनारे बोगनबेलिया की झाड़ियां, अहा! शोभा देखते ही बनती है। बेचारी नदियां भी यूं ही बही जा रही थीं, साल-दर-साल। हमने अपनी इन माताआंे को बांधों में शानदार जगह दी है। जो बच गईं, उनके किनारों पर शानदार घाट बनाए। एक-दो नहीं, लाखों-करोड़ों लोग उनकी पूजा करने आते हैं। और हां, हमने आपके भाई-बंधुओं को तराशकर और सुंदर बना दिए हैं। आप यह सब नजारा देखोगो को आश्चर्य से भर उठोगे। दिखाऊं?’

उस भोली सूरत के आदमी ने पहाड़ के जवाब का इंतजार किए बगैर ही लैपटॉप खोल पावर पाइंट प्रजेंटेशन की तैयारी शुरू कर दी। वह भोली सूरत वाला आदमी आज के जमाने का शातिर आदमी है। उसे पता है कि झांसा देने का पहला स्टेप पावर पॉइंट प्रजेंटेशन ही होता है। ‘दद्दू देखना विकास की कहानी, आप भी कहोगे, वाह इंसान, ये तूने क्या कर दिया कमाल!’

पहाड़ ने उसे रोकते हुए कहा, ‘ये तू तेरी मशीन को रहने दे भाई। मेरे पास तो बहुत समय है, पर तेरा समय कीमती है। ये तू अपना समय क्यों बर्बाद कर रहा है? तू तो सीधे मुझे यह बता कि आखिर मुझसे क्या चाहता है।’

‘मेरे पास तो बहुत समय है’, यह सुनकर पहाड़ के भोलेपन पर आदमी का कमीनापन भीतर ही भीतर हंस पड़ा। पर ऊपर से गंभीर होने का दिखावा करके पूरी मासूमियम से कहा, ‘दद्दू, आपको अपनी कीमत नहीं पता, मैं बस यही बताने आया हूं। आप एक बार यह प्रजेंटेशन देख लीजिए। इसमें आपको बताएंगे कि आपके भीतर कितना खजाना छुपा हुआ है। बस थोड़ा-सा निकालेंगे और फिर देखिएगा, आपके सानिध्य में हम इंसान विकास की िकतनी ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे।’

‘अरे, तू मेरी ऊंचाई को खत्म करके अपनी ऊंचाई चाहता है?’ पहाड़ के सामने इंसानी भोलेपन की परत उतरती जा रही है। पहाड़ गुस्से में थोड़ा थरथरा भी रहा है। ‘तू मुझे खोदना चाहता है? नहीं, मैं तुझे हाथ भी नहीं लगाने दूंगा।’

‘डोंट वरी दद्दू, हम आपकी ऊंचाई को नहीं छेड़ने वाले। वे जो टुच्ची-सी पहाड़िया हैं ना, सौ मीटर से नीची, बस उन्हें खोदेंगे। उनकी क्या औकात भला? वैसे भी ये विकास में बाधक हैं। हटाने दीजिए उन्हें।’

‘मुझे क्या इंसान समझ रखा है? वे भले ही छोटी हैं, लेकिन मेरे ही सिस्टम का हिस्सा हैं। उन्हें हाथ भी लगाकर देख लो।’

‘तो क्या कर लोगे, ऐ पहाड़?’ अब आदमी ने भी भोलेपन की केंचुली छोड़ दी है।

‘सरकार नाम की कोई चीज है कि नहीं! मैं उसके पास जाऊंगा। सुप्रीम कोर्ट के पास जाऊंगा। पर तेरी साजिश सफल नहीं होने दूंगा।’

आदमी अब पूरे कमीनेपन के साथ हंसने लगा है। पहाड़ वाकई उससे भी ज्यादा भोला निकला, जितना भोला इंसान ने उसे समझा था। हंसते हुए वहां से लौट आया है, वापस लौटने के लिए।

आदमी को लग रहा है कि पहाड़ बेमतलब में अपनी चिंता में मरा जा रहा है। लेकिन मूर्ख आदमी को पता नहीं कि पहाड़ अपने लिए नहीं, आदमी के लिए ही चिंतित है। पहाड़ न रहा तो आदमी भी नहीं रहेगा।  

 (घोषणा : प्रख्यात व्यंग्यकार श्री ज्ञान चतुर्वेदी जी के एक व्यंग्य ‘आदमी और नदी’ से प्रेरित।)

(#aravalli_protest, #अरावली पर्वत खनन विरोध, #अरावली पर्वत सुप्रीम कोर्ट)

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

बहस पर बहस करने वाले बस जावेद साहब की आखिरी लाइन पर गौर करें...!

By Jayjeet


दो दिन पहले लल्लनटॉप पर ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व को लेकर जावेद अख्तर और मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच हुई बहस के बाद कई तरह की बहसें हो रही हैं। ईश्वर एक ऐसा विषय है, जिस पर अंतहीन बहस हो सकती है। लेकिन करीब दो घंटे की इस बहस में सबसे अच्छी बात मुझे वह लगी, जो जावेद साहब ने सबसे अंत में कही। शायद पूरी बहस देखने के बाद भी अधिकांश लोगों को इल्म नहीं होगा कि वे आखिर में सबसे खूबसूरत बात क्या कह गए... इसकी चर्चा आगे...

रवीश कुमार सहित कई लोगों ने आशंका जताई है कि इस बहस ने देश में साम्प्रदायिकता के प्रसार के लिए लोगों को नया मसाला दे दिया है। इस समय भयंकर ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहे इस देश में यह दिक्कत तो है कि ऐसी सार्थक बहसों के साथ भी ऐसी आशंकाएं चिपक जा रही हैं। फिर भी, धार्मिक ध्रुवीकरण तो किसी एक इलेक्शन या किसी लल्लू-पल्लू नेता के भाषण से भी हो जाता है। तो बहस से ही सही...

एक विडंबना यह भी कि इस बहस को कई लोग हार-जीत के तौर पर देख रहे हैं। यह बहस एक नास्तिक और एक आस्तिक (बिलिवर) के बीच थी। मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी केवल ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व के समर्थक के तौर पर प्रतिनिधि भर थे। उनकी जगह कोई हिंदू पंडित या ईसाई पादरी भी हो सकता था। इसलिए उन्हें इस्लाम का प्रतिनिधि मानने के बजाय तमाम 'आस्तिकों' का प्रतिनिधि मानना चाहिए, जिनकी ईश्वर के आस्था है। इसलिए बहस किसी धर्म के खिलाफ या धर्म के समर्थन में नहीं कही जा सकती। लेकिन दुर्भाग्य से जहां एक तबका इसे मुस्लिम धर्म की विजय बता रहा है, तो वहीं दूसरा तबका जावेद अख्तर के साथ केवल इसलिए खड़ा नजर आ रहा है, क्योंकि वे एक मौलवी के तर्कों का जवाब दे रहे थे (इनमें अधिकांश लोग वे भी हो तो आश्चर्य नहीं, जो जावेद साहब को गाहे-बगाहे पाकिस्तान जाने का हुक्म सुनाते रहते हैं)।

तमाम साम्प्रदायिक समस्याओं के बावजूद देश इस तरह के विषयों पर बहस करने लगा है, यह सबसे सकारात्मक लक्षण है। जैसा कि जावेद साहब ने कहा कि क्या यह बहस आज से सौ साल पहले हो सकती थी? एक व्यक्ति ईश्वर/खुदा पर सवाल उठाए, क्या यह सोचा जा सकता था? मुस्लिम सम्प्रदाय की परिभाषा में जावेद साहब की कई बातों को एक 'काफिर' द्वारा की गई ईशनिंदा मानकर उनके खिलाफ फतवे जारी किए जा सकते हैं। अच्छी बात है कि अब तक ऐसे किसी फतवे के जारी होने की कोई खबर नहीं है और उम्मीद है कि ऐसा होगा भी नहीं। यह बड़ी बात है और यह उसी बदलाव का संकेत है, जिसकी जावेद साहब भविष्य में उम्मीद रखते हैं।

खुदा/ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, इस विचार को किसी पर थोपा नहीं जा सकता। सभी को लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे इसे मानें या न मानें। लेकिन जावेद साहब ने इसके जरिए तमाम धर्मों की प्रासंगिकता पर सवाल जरूर उठाए हैं और इस पर आगे भी बहस होनी चाहिए। बहस होनी चाहिए कि आखिर अगर मजहब केवल लड़ना सिखाएं तो हमें ये धर्म या मजहब क्यों चाहिए?

अंत में वही बात, जिसके लिए मुझे इतना सबकुछ लिखना पड़ा। जावेद साहब ने चलते-चलते कहा- 'बहस के बाद अब मैं इन मौलवी साहब के साथ खाना खाने वाला हूं' ... यही सबसे अच्छी और खूबसूरत बात थी। इस सामान्य से वाक्य के भी संकेत गहरे हैं : असहमति में भी इतनी गुंजाइश होनी चाहिए कि साथ खाना खाया जा सके, आगे की चर्चा की जा सके, हम कुछ दूसरों से ग्रहण कर सके, कोई दूसरा हमसे ग्रहण कर सके... और यह बात हर क्षेत्र में लागू होनी चाहिए - असहमतियों का सह-अस्तित्व।

तो, अगर आप अपनी-अपनी वजहों से दोनों वक्ताओं का समर्थन कर रहे हैं तो कृपया इनसे इस बात की सीख भी जरूर लीजिए।

#Javedakhtar #javedakhtarvsmuftishamail

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

नदियों के सत्यानाश के लिए और 20 करोड़ लोग क्यों चाहिए?

By Jayjeet
दुनिया की 10 शीर्ष स्वच्छ नदियों में से सारी की सारी उन देशों में हैं, जहां नदियों की पूजा नहीं की जाती। भारत की कभी सर्वाधिक स्वच्छ नदी मानी जाने वाली उमंगोट भी अब इस सूची से बाहर हो चुकी है।
आज अचानक से नदियों का जिक्र इसलिए क्योंकि कल ही संघ के एक विद्वान नेता दत्तात्रेय होसबले ने बड़ी मासूमियत से पूछा था कि अगर मुस्लिम लोग नदी की पूजा करें तो क्या हर्ज है?
इन दिनों दूसरों के गिरेबान में झांकने का शौक कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। पूजा के नाम पर हम हिंदू लोग नदियों का कितना सत्यानाश कर रहे हैं, इसकी चिंता करने या इस पर कोई सकारात्मक विमर्श शुरू करने के बजाय हमें फिक्र इस बात की ज्यादा हो रही है कि विधर्मी लोग नदियों की पूजा क्यों नहीं कर रहे? यह उतना ही बड़ा पाखंड है, जितना कि भ्रष्टाचार में पगे लोग वंदे मातरम गाते हुए न गाने वालों को पाकिस्तान भेजने की धमकी देते हैं।
हाल ही में एक खबर आई थी कि केदरानाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालु लोग अपने आराध्य स्थल पर इतना कचरा छोड़ आए कि उसे नीचे लाने में सरकार को करोड़ों खर्च करने होंगे। यह विडंबना नहीं कि हम उन्हीं चीजों का सत्यानाश करने पर तूले रहते हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं? और ऊपर से हम चाहते हैं कि इस इकोसिस्टम में 10-20 करोड़ लोगों का भार और आ जाए? इसी संदर्भ में एक प्रसंग का उल्लेख समीचीन है। हमारे एक मित्र जापान गए थे। वहां एक मंदिर में बहुत ढूंढने पर उन्हें बड़ी मुश्किल से एक डस्टबिन मिला। पता चला कि जापानी तो अपना कचरा वापस साथ ले जाते हैं। हमारे जैसे भारतीयों के लिए ही शायद एक-आध डस्टबिन लगाया गया था। जापान भी आस्थावान देश है। लेकिन दो आस्थावान देशों के नागरिकों में भी कितना अंतर है? और क्यों है? लोहिया जी के शब्दों में, दुनिया में सर्वाधिक ढोंगी कोई कौम है तो वह भारतीय है।
होसबले यहीं नहीं रुके। (जैसा कि अखबारों में छपा है), उन्होंने कहा, 'मुस्लिमों को पर्यावरण संरक्षण के लिए नदियों, पेड़ों और सूर्य का सम्मान करने से कोई नुकसान नहीं होगा।'
मैं इससे सहमत हूं। लेकिन सम्मान करने की बात पहले अपने घर के लोगों से कहिए। हिंदुओं से कहिए कि पूजा के बाद अपना कचरा मां गंगा या मां नर्मदा के हवाले करने के बजाय साथ ले जाएं और अगर एक भी पेड़ कटे तो उसके लिए उतना ही हंगामा करने के लिए तैयार रहें, जितना की गौ-रक्षा के नाम पर करते हैं। आखिर देश में करीब एक बिलियन लोग हिंदू हैं। पर्यावरण और पेड़ों को बचाने के लिए इन्हें और 20 करोड़ों लोगों की क्या जरूरत? वैसे भी सनातनी परंपरा में तो मंदिरों से भी पहले पेड़ों की पूजा की जाती थी? तो अगर हम वाकई सनातनी हैं तो स्वयं अपने कर्तव्य को पूरा करें, फिर दूसरों को ज्ञान दें।
पुनश्च... हाल ही में दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी टेम्स में पैर धोते एक युवक का वीडियो वायरल हुआ था। बताने की जरूरत नहीं कि वह भारतीय मूल का युवक था। लदंन प्रशासन ने युवक पर जुर्माना लगाकर भविष्य में ऐसा न करने के प्रति सख्ती से आगाह किया था। तो नदियों की पूजा ऐसे भी तो की जा सकती है?

मंगलवार, 29 जुलाई 2025

चंदन चाचा के बाड़े में, नाग पंचमी की कविता (Nag panchami classic kavita )





नागपंचमी (Nag panchami) से संबंधित कविता चंदन चाचा के बाड़े में ...( chandan chacha ke bade me)। इसे मप्र के जबलपुर के कवि नर्मदा प्रसाद खरे ने लिखा था। इसे सबसे पहले 1960 के दशक में कक्षा 4 की बाल भारती में शामिल किया गया था। हालांकि कुछ सोर्स इसके कवि सुधीर त्यागी बताते हैें। 

नर्मदा प्रसाद खरे/सुधीर त्यागी
सूरज के आते भोर हुआ
लाठी लेझिम का शोर हुआ
यह नागपंचमी झम्मक-झम
यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम
मल्लों की जब टोली निकली।
यह चर्चा फैली गली-गली
दंगल हो रहा अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

सुन समाचार दुनिया धाई,
थी रेलपेल आवाजाई।
यह पहलवान अम्बाले का,
यह पहलवान पटियाले का।
ये दोनों दूर विदेशों में,
लड़ आए हैं परदेशों में।
देखो ये ठठ के ठठ धाए
अटपट चलते उद्भट आए
थी भारी भीड़ अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

वे गौर सलोने रंग लिये,
अरमान विजय का संग लिये।
कुछ हंसते से मुसकाते से,
मूछों पर ताव जमाते से।
जब मांसपेशियां बल खातीं,
तन पर मछलियां उछल आतीं।
थी भारी भीड़ अखाड़े में,
चंदन चाचा के बाड़े में॥

यह कुश्ती एक अजब रंग की,
यह कुश्ती एक गजब ढंग की।
देखो देखो ये मचा शोर,
ये उठा पटक ये लगा जोर।
यह दांव लगाया जब डट कर,
वह साफ बचा तिरछा कट कर।
जब यहां लगी टंगड़ी अंटी,
बज गई वहां घन-घन घंटी।
भगदड़ सी मची अखाड़े में,
चंदन चाचा के बाड़े में॥

वे भरी भुजाएं, भरे वक्ष
वे दांव-पेंच में कुशल-दक्ष
जब मांसपेशियां बल खातीं
तन पर मछलियां उछल जातीं
कुछ हंसते-से मुसकाते-से
मस्ती का मान घटाते-से
मूंछों पर ताव जमाते-से
अलबेले भाव जगाते-से
वे गौर, सलोने रंग लिये
अरमान विजय का संग लिये
दो उतरे मल्ल अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

तालें ठोकीं, हुंकार उठी
अजगर जैसी फुंकार उठी
लिपटे भुज से भुज अचल-अटल
दो बबर शेर जुट गए सबल
बजता ज्यों ढोल-ढमाका था
भिड़ता बांके से बांका था
यों बल से बल था टकराता
था लगता दांव, उखड़ जाता
जब मारा कलाजंघ कस कर
सब दंग कि वह निकला बच कर
बगली उसने मारी डट कर
वह साफ बचा तिरछा कट कर
दंगल हो रहा अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

# nag-panchami-kavita  # नागपंचमी की कविता #चंदन चाचा के बाड़े में

रविवार, 29 जून 2025

(Indian Shubhnshu Shukla in ISS) क्या कभी अंतरिक्ष भारत के लिए 'न्यू नॉर्मल' बन सकेगा?

By Jayjeet

बेशक, छोटी-छोटी उपलब्धियों पर हमें खुश होना चाहिए, गर्व करना चाहिए। लेकिन जब मामला देश का हो तो गर्व के साथ-साथ हमें चिंतन भी करना चाहिए।
41 साल बाद कोई भारतीय अंतरिक्ष में पहुंचा है। तो आइए, खुशी के साथ-साथ एक गंभीर विमर्श भी करें। यह धर्म, जाति, सम्प्रदाय के मुद्दों पर सत्ता पर काबिज होने वाली सरकारों के समक्ष सवाल उठाने का भी बेहतरीन मौका है। बड़ा सवाल यही है- दो अंतरिक्ष यात्रियों के बीच चार दशक का समय कैसे लग गया?
हम कितने सफल हैं या हम कितने पीछे हैं, इसका कोई तो पैमाना होना चाहिए। हमें चीन को इस पैमाने के तौर पर सामने रखना चाहिए, क्योंकि वह हमारा स्वाभाविक प्रतिद्वंद्वी भी है। अमेरिका से तुलना बेमानी होगी।
चीन के साथ भी तुलना करते समय हमें उसके क्षेत्रफल और वहां की अपेक्षाकृत स्थाई सरकारों के परिदृश्य को ध्यान में रखना होगा। इसलिए उसकी तुलना में हर क्षेत्र में भारत की तीन से पांच गुना तक की कमी को जायज मानना चाहिए। तो भारत के 2 अंतरिक्ष यात्रियों की तुलना में चीन के 8 से 10 अंतरिक्ष यात्रियों का आंकड़ा होता तो मान सकते थे कि हम पीछे कतई नहीं हैं।
लेकिन जब हम अंतरिक्ष में चीन के मिशनों को एक्सप्लोर करते हैं तो पता चलता है कि हम जमीन पर है और चीन आसमान में। वैसे तो चीन के कितने ही स्पेस मिशन हैं, लेकिन हम केवल अंतरिक्ष यात्रियों की ही बात कर लें, तब भी यह अंतर हमसे कहता है कि असल इतिहास रचने के लिए हमें लंबा सफर तय करना बाकी है।
चीन ने अपने मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की शुरुआत 2003 में की थी। इस लिहाज से तो वह भारत से पिछड़ा हुआ ही माना जाएगा! भारत के राकेश शर्मा तो 1984 में ही अंतरिक्ष की तफरीह कर आए थे, मगर रूसी अंतरिक्ष मिशन के साथ। अब शुभांशु शुक्ला पूरे 41 साल बाद अंतरिक्ष में गए हैं, अमेरिकी मिशन के साथ।
इस दौरान चीन ने क्या किया? उसने अपने स्वदेशी मिशन ‘शेनझोउ' पर काम किया। बीते 22 साल में ही वह 26 अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेज चुका है। सारे के सारे उसके स्वदेशी अंतरिक्ष यान ‘शेनझोउ' से गए हैं।
हमें ज्यादातर खबरें इंटरनेशनल अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की ही पढ़ने को मिलती हैं। शुभांशु भी वहीं गए हैं। लेकिन चीन का अपना अंतरिक्ष स्टेशन हैं - तियांगोंग स्पेस स्टेशन। ISS की तरह यह भी अंतरिक्ष में एक स्थाई स्टेशन है। उसके सारे यात्री वहीं जाते हैं, वहीं रहते हैं और वहीं प्रयोग करते हैं। वहां जाना अब चीन का ‘ओल्ड नॉर्मल' बन चुका है।
41 साल के सफर की यह पूरी कहानी देश को शर्मिंदा करने के लिए नहीं है। देश कभी शर्मिंदा नहीं होता। मगर हमारे महान देश के कर्णधारों को इस पर विचार करने के लिए काफी होनी चाहिए, जो अब भी धर्म और जाति को लेकर देश को हलाकान किए रहते हैं।

रविवार, 25 मई 2025

कराची बेकरी V/S बॉम्बे बेकरी...!

By Jayjeet

जैसे भारत के हैदराबाद में कराची बेकरी है, वैसे ही पाकिस्तान के हैदराबाद में बॉम्बे बेकरी है। इसको लेकर हाल ही में पाकिस्तान के सबसे बड़े अखबार डॉन ने लिखा, "जहां भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने हिंदुस्तान के हैदराबाद स्थित कराची बेकरी में तोड़-फोड़ की, वहीं (पाकिस्तानी) हैदराबाद स्थित बॉम्बे बेकरी में हमेशा की तरह उससे मोहब्बत करने वालों की भीड़ उमड़ी रही।"
करीब 114 साल पुरानी इस बॉम्बे बेकरी का स्वामित्व एक हिंदू थड्‌डानी परिवार के पास है। इसी अखबार की रिपोर्ट में कुछ लोगों को उद्धृत करते हुए कहा गया- 'बॉम्बे बेकरी हमारे पाकिस्तान की शान है और हमें इस पर गर्व है। कोई इसे हाथ भी नहीं लगा सकता...।' (और किसी ने हाथ लगाया भी नहीं)।
यह पाकिस्तान का अखबार है और इसलिए आप इसकी इस रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज करने को स्वतंत्र हैं। लेकिन यहां यह भी बता दूं कि इस अखबार ने हालिया टकराव को लेकर अपनी सरकार को उसी तरह आड़े हाथ लिया है, जैसे भारत में कुछ 'गद्दार' टाइप के पत्रकार और स्वतंत्र लेखक सरकार से सवाल पूछने की हिमाकत कर रहे हैं।
इस खबर को मैं केवल उस परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश कर रहा हूं, जिसमें जयपुर और इंदौर में कुछ मिठाई वालों ने हमारी मिठाइयों की सांस्कृतिक पहचान को ही बदलने की नापाक कोशिश की है। मैसूर पाक, खोपरा पाक के नाम से 'पाक' शब्द हटाने जैसी हास्यास्पद हरकतें की गईं और कतिपय मूर्खों ने इसका समर्थन किया है।
एक तथ्य और जान लेते हैं। पाकिस्तान के कोट राधा किशन शहर में अमृतसर स्वीट्स है। इसी तरह कराची में दिल्ली स्वीट्स और इस्लामाबाद में अंबाला बेकर्स के नाम से मिठाई की दुकानें हैं। ये तमाम दुकानें आज भी अपना बिजनेस कर रही हैं और यहां किसी तरह की तोड़फाड़ नहीं की गई है। बेशक, वहां भी योगियों की कमी नहीं हैं, बल्कि ज्यादा ही होंगे, लेकिन ' कोट राधा किशन' जैसा नाम आज भी बरकरार है और यह चौंकाता भी है।
दिक्कत यह है कि हमने देशभक्ति और गद्दारी के बड़े आसान से मानक बना लिए हैं। किसी भी नाम से 'पाक' हटा दो, आप देशभक्त बन जाएंगे!!! क्या देशभक्ति के लिए कुछ थोड़े कठिन मानक नहीं रखे जाने चाहिए? ऐसा ही गद्दारी के साथ भी हो। 'कराची बेकरी' का समर्थन करने वाला क्या गद्दार हो जाएगा?
(तस्वीर : Dawn अखबार से...)

गुरुवार, 22 मई 2025

(Sweet name changed, PAK word removed ) मैसूर पाक नाम बदलने से खुश, मगर उठाया 'चीनी' का सवाल!

 

Sweet name changed, PAK word removed, मैसूर पाक, मैसूर श्री,
By A Jayjeet

जैसे ही खबर मिली कि मैसूर पाक से 'पाक' हटा दिया गया है, रिपोर्टर तुरंत पहुंच गया उससे क्विक इंटरव्यू लेने....
रिपोर्टर: कैसा लग रहा है आपके नाम में से 'पाक' जैसे 'नापाक' को हटाने से? अब आप 'मैसूर श्री' हो गई है।
मैसूर श्री: इस समय तो मैं अच्छा ही कहूंगी। अभी कुछ भी बुरा कहने का वक्त नहीं है, समझें!
(रिपोर्टर ने भी यह सुनकर राहत की सांस ली। बुरा कहती, तब भी रिपोर्ट कैसे करता!)
रिपोर्टर: ऐसा ना लग रहा कि अब जब आपके चाहने वाले आपको खाएंगे तो उनमें देशभक्ति का एक नया जज्बा, मतलब की देशभक्ति की नई भावना पैदा हो जाएगी?
मैसूर श्री: हां, पर शायद आधी-अधूरी।
रिपोर्टर: हें... क्या मतलब?
मैसूर श्री: मतलब यह कि इसमें 'चीनी' तो अभी भी है। उसका क्या करेंगे? (हालांकि उसने तुरंत ही यह स्पष्ट कर दिया था कि ये सवाल नहीं है, सिर्फ एक जिज्ञासा है।)
इतने में पास में बैठा मोती पाक (परिवर्तित नाम- मोती श्री) बोल उठा- इसका तो बड़ा सिंपल सॉल्यूशन है। सरकार को बस एक यही तो आदेश जारी करना है कि 'चीनी' को हर स्थिति में 'शक्कर' ही कहा जाएगा। चीनी को 'चीनी' कहना राष्ट्रविरोधी कृत्य माना जाएगा।
तो इस आम सहमति के बाद रिपोर्टर भी खुशी-खुशी वापस लौट गया।
हालांकि ऑफ द रिकॉर्ड बता दें कि उसी वक्त खोपरा श्री ने यह सवाल उठाने की कोशिश की थी कि देश में आधी से ज्यादा चीजें 'चीनी' हैं, उनका क्या करेंगे? लेकिन तमाम राष्ट्रवादी मिठाइयों ने ऐसे देशद्रोही सवाल पर उसका मुंह बंद कर दिया!!

Photo : कतिपय कारणों से मैसूर श्री ने अपनी खिंचवाने मना कर दिया। इसलिए उनकी जगह स्वर्ण भस्म श्री की तस्वीर दी जा रही है। वे एलीट वर्ग की राष्ट्रवादी विचारधारा से ताल्लुक रखती है।

 

 

शनिवार, 17 मई 2025

शीर्ष अदालत में केविएट दायर करेगी गटर... क्यों? जानिए उसी की जुबानी...

By Jayjeet

एक अदालत द्वारा फलाने मंत्री महोदय की भाषा को 'गटरछाप' बताने से गटर आहत हैं। पत्रकार ने गटर से सीधी बात की...
- पता चला कि आप आहत हैं? क्यों?
- आप जानते ही हैं कि हाई कोर्ट ने फलाना मंत्री के दिल, दिमाग, जुबान वगैरह-वगैरह की तुलना मुझसे की है। एक गैरतमंद गटर यह तुलना कैसे बर्दाश्त कर सकती है। आप करते?
- आपको भी तीन दिन हो गए? अब तक चुप क्यों रही?
- ठीक सवाल है। भले ही कुछ लोग अपने आप को कोर्ट से ऊपर मानते हो, लेकिन मेरे मन में माननीय कोर्ट के प्रति पूरा सम्मान है। मैं कड़वां घूंट पीकर बैठ गई कि चलो, मेरे ही बहाने मालिक लोग अपने शागिर्द के खिलाफ कुछ कार्रवाई कर लेंगे। तो मैं यह बेइज्जती भी बर्दाश्त कर लेती। आखिर सेना और महिलाओं के सम्मान के आगे इस बेइज्जती का कोई मोल नहीं है।
- आगे क्या करने का इरादा है?
- जैसे वह फलाना मंत्री शीर्ष अदालत में गया है, वैसे ही मैं भी शीर्ष अदालत में जा रही हूं। मैं वहां केविएट दाखिल करके सुप्रीम कोर्ट से आग्रह करुंगी कि किसी भी आलतू-फालतू मंत्री-संत्री या नेता वगैरह की तुलना मुझसे करने से पहले मेरा भी पक्ष सुना जाए। हर अदालत के लिए ऐसे निर्देश जारी करने का अनुरोध किया जाएगा। आखिर समाज में मेरी भी कोई प्रतिष्ठा है। मैं बगैर शपथ लिए अपने दायित्व निभाती हूं।