By Jayjeet
दो दिन पहले लल्लनटॉप पर ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व को लेकर जावेद अख्तर और मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच हुई बहस के बाद कई तरह की बहसें हो रही हैं। ईश्वर एक ऐसा विषय है, जिस पर अंतहीन बहस हो सकती है। लेकिन करीब दो घंटे की इस बहस में सबसे अच्छी बात मुझे वह लगी, जो जावेद साहब ने सबसे अंत में कही। शायद पूरी बहस देखने के बाद भी अधिकांश लोगों को इल्म नहीं होगा कि वे आखिर में सबसे खूबसूरत बात क्या कह गए... इसकी चर्चा आगे...
रवीश कुमार सहित कई लोगों ने आशंका जताई है कि इस बहस ने देश में साम्प्रदायिकता के प्रसार के लिए लोगों को नया मसाला दे दिया है। इस समय भयंकर ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहे इस देश में यह दिक्कत तो है कि ऐसी सार्थक बहसों के साथ भी ऐसी आशंकाएं चिपक जा रही हैं। फिर भी, धार्मिक ध्रुवीकरण तो किसी एक इलेक्शन या किसी लल्लू-पल्लू नेता के भाषण से भी हो जाता है। तो बहस से ही सही...
एक विडंबना यह भी कि इस बहस को कई लोग हार-जीत के तौर पर देख रहे हैं। यह बहस एक नास्तिक और एक आस्तिक (बिलिवर) के बीच थी। मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी केवल ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व के समर्थक के तौर पर प्रतिनिधि भर थे। उनकी जगह कोई हिंदू पंडित या ईसाई पादरी भी हो सकता था। इसलिए उन्हें इस्लाम का प्रतिनिधि मानने के बजाय तमाम 'आस्तिकों' का प्रतिनिधि मानना चाहिए, जिनकी ईश्वर के आस्था है। इसलिए बहस किसी धर्म के खिलाफ या धर्म के समर्थन में नहीं कही जा सकती। लेकिन दुर्भाग्य से जहां एक तबका इसे मुस्लिम धर्म की विजय बता रहा है, तो वहीं दूसरा तबका जावेद अख्तर के साथ केवल इसलिए खड़ा नजर आ रहा है, क्योंकि वे एक मौलवी के तर्कों का जवाब दे रहे थे (इनमें अधिकांश लोग वे भी हो तो आश्चर्य नहीं, जो जावेद साहब को गाहे-बगाहे पाकिस्तान जाने का हुक्म सुनाते रहते हैं)।
तमाम साम्प्रदायिक समस्याओं के बावजूद देश इस तरह के विषयों पर बहस करने लगा है, यह सबसे सकारात्मक लक्षण है। जैसा कि जावेद साहब ने कहा कि क्या यह बहस आज से सौ साल पहले हो सकती थी? एक व्यक्ति ईश्वर/खुदा पर सवाल उठाए, क्या यह सोचा जा सकता था? मुस्लिम सम्प्रदाय की परिभाषा में जावेद साहब की कई बातों को एक 'काफिर' द्वारा की गई ईशनिंदा मानकर उनके खिलाफ फतवे जारी किए जा सकते हैं। अच्छी बात है कि अब तक ऐसे किसी फतवे के जारी होने की कोई खबर नहीं है और उम्मीद है कि ऐसा होगा भी नहीं। यह बड़ी बात है और यह उसी बदलाव का संकेत है, जिसकी जावेद साहब भविष्य में उम्मीद रखते हैं।
खुदा/ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, इस विचार को किसी पर थोपा नहीं जा सकता। सभी को लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे इसे मानें या न मानें। लेकिन जावेद साहब ने इसके जरिए तमाम धर्मों की प्रासंगिकता पर सवाल जरूर उठाए हैं और इस पर आगे भी बहस होनी चाहिए। बहस होनी चाहिए कि आखिर अगर मजहब केवल लड़ना सिखाएं तो हमें ये धर्म या मजहब क्यों चाहिए?
अंत में वही बात, जिसके लिए मुझे इतना सबकुछ लिखना पड़ा। जावेद साहब ने चलते-चलते कहा- 'बहस के बाद अब मैं इन मौलवी साहब के साथ खाना खाने वाला हूं' ... यही सबसे अच्छी और खूबसूरत बात थी। इस सामान्य से वाक्य के भी संकेत गहरे हैं : असहमति में भी इतनी गुंजाइश होनी चाहिए कि साथ खाना खाया जा सके, आगे की चर्चा की जा सके, हम कुछ दूसरों से ग्रहण कर सके, कोई दूसरा हमसे ग्रहण कर सके... और यह बात हर क्षेत्र में लागू होनी चाहिए - असहमतियों का सह-अस्तित्व।
तो, अगर आप अपनी-अपनी वजहों से दोनों वक्ताओं का समर्थन कर रहे हैं तो कृपया इनसे इस बात की सीख भी जरूर लीजिए।
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