भोली सूरत वाला वह आदमी पहाड़ के नीच आकर खड़ा हो गया।
पहाड़ भी भोला-भाला। आदमी की तरह केवल सूरत से नहीं, सीरत से भी।
उस भोली सूरत वाले आदमी ने पहाड़ को दद्दू कहकर पुकारा तो पहाड़ स्नेह से
भर उठा।
पहाड़ को लगा कि यह आदमी उसके साथ कुछ सुकून के पल बिताने आया होगा। कुछ
दिन बंशी बजाएगा और चला जाएगा। लेकिन पहाड़ को पता नहीं कि आदमी के भीतर की अशांति इतनी
बढ़ गई है कि पहाड़ के साथ कुछ पल बिताना ही काफी नहीं है। अब वह पूरे पहाड़ को ही अपने
में बिताना चाहता है।
‘कैसे आए हो बेटा? तुम आज ज्यादा ही चिंतित दिख रहे हो?’
‘हां, दद्दू बहुत बेचैन हूं, चिंता खाए जा रही है,’ भोले आदमी ने और भी
ऊपरी भोलेपन से कहा।
‘बेटा, यह पूरा पहाड़ तुम्हारा
है, तुम्हारे लिए है, तुम्हारे बच्चों के लिए है। मेरी गोद में आओ और सबकुछ भूल जाओ।’
पहाड़ कितना भी अनुभवी क्यों न हो, पर मन से वह भोला ही है, इतना भोला कि
वह आदमी के ऊपरी भोलेपन को ताड़ नहीं पाया। अपने भीतरी कमीनेपन को भोलेपन से किस तरह
छुपाया जा सकता है, मार्केटिंग गुरुओं की साेबत में आदमी यह सीख गया है।
आदमी ने अपने दुखियारे चेहरे पर मासूमियत का मुल्लमा लगाते हुए कहा, ‘दद्दू,
मैं आपके साथ समय बिताने नहीं आया हूं। मैं इस समय सबसे बड़े मसले विकास को लेकर चिंतित
हो रहा हूं।’
‘विकास?’ पहाड़ को अचानक से कुछ समझ में नहीं आया। आखिर भोले आदमी ने भी
तो अचानक से विकास की चर्चा छेड़ दी थी।
आदमी ने अपने कमीनेपन पर भोलेपन की परत गहरी करते हुए कहा, ‘देखो, दुनिया कितनी आगे
बढ़ गई है। मैं चाहता हूं कि हम भी विकास करें, आप भी विकास करें। इसमें आपका भी साथ
चाहिए। सबका साथ सबका विकास से ही तो हम आगे बढ़ेंगे।’
पकाड़ ने विकास का नाम तो सुन रखा है, पर इस शब्द का असल मतलब नहीं जानता।
आखिर, लाखों साल पुरानी परवरिश है। कैसे जान सकता है?
पहाड़ ने कहा, ‘बच्चे, विकास मतलब कहीं वही तो नहीं? पेड़ों को काट देना,
नदियों की धाराएं मोड़ देना। मैंने सुना है, अब तो मेरे जैसे कुछ पहाड़ भी खोद दिए गए
हैं!’
भोली सूरत वाला आदमी चौंक गया। उसने पहाड़ को वाकई भोला ही समझा था, मगर
वह उसकी उम्मीदों से थोड़ा कम भोला निकला।
भोले आदमी ने तुरंत गियर बदला। ‘नहीं नहीं। आप भी कहां विकास विरोधी लोगों
के झांसे में आ गए। हमने पेड़ काटे तो लगाए भी हैं। खूबसूरत कॉलोनियों में ताड़ के लगाए
पेड़, हाईवे के किनारे बोगनबेलिया की झाड़ियां, अहा! शोभा देखते ही बनती है। बेचारी नदियां
भी यूं ही बही जा रही थीं, साल-दर-साल। हमने अपनी इन माताआंे को बांधों में शानदार
जगह दी है। जो बच गईं, उनके किनारों पर शानदार घाट बनाए। एक-दो नहीं, लाखों-करोड़ों
लोग उनकी पूजा करने आते हैं। और हां, हमने आपके भाई-बंधुओं को तराशकर और सुंदर बना
दिए हैं। आप यह सब नजारा देखोगो को आश्चर्य से भर उठोगे। दिखाऊं?’
उस भोली सूरत के आदमी ने पहाड़ के जवाब का इंतजार किए बगैर ही लैपटॉप खोल
पावर पाइंट प्रजेंटेशन की तैयारी शुरू कर दी। वह भोली सूरत वाला आदमी आज के जमाने का
शातिर आदमी है। उसे पता है कि झांसा देने का पहला स्टेप पावर पॉइंट प्रजेंटेशन ही होता
है। ‘दद्दू देखना विकास की कहानी, आप भी कहोगे, वाह इंसान, ये तूने क्या कर दिया कमाल!’
पहाड़ ने उसे रोकते हुए कहा, ‘ये तू तेरी मशीन को रहने दे भाई। मेरे पास
तो बहुत समय है, पर तेरा समय कीमती है। ये तू अपना समय क्यों बर्बाद कर रहा है? तू
तो सीधे मुझे यह बता कि आखिर मुझसे क्या चाहता है।’
‘मेरे पास तो बहुत समय है…’, यह सुनकर पहाड़
के भोलेपन पर आदमी का कमीनापन भीतर ही भीतर हंस पड़ा। पर ऊपर से गंभीर होने का दिखावा
करके पूरी मासूमियम से कहा, ‘दद्दू, आपको अपनी कीमत नहीं पता, मैं बस यही बताने आया
हूं। आप एक बार यह प्रजेंटेशन देख लीजिए। इसमें आपको बताएंगे कि आपके भीतर कितना खजाना
छुपा हुआ है। बस थोड़ा-सा निकालेंगे और फिर देखिएगा, आपके सानिध्य में हम इंसान विकास
की िकतनी ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे।’
‘अरे, तू मेरी ऊंचाई को खत्म करके अपनी ऊंचाई चाहता है?’ पहाड़ के सामने इंसानी भोलेपन की परत उतरती जा रही है। पहाड़ गुस्से में थोड़ा थरथरा भी रहा है। ‘तू मुझे खोदना चाहता है? नहीं, मैं तुझे हाथ भी नहीं लगाने दूंगा।’
‘डोंट वरी दद्दू, हम आपकी ऊंचाई को नहीं छेड़ने वाले। वे जो टुच्ची-सी पहाड़िया हैं ना, सौ मीटर से नीची, बस उन्हें खोदेंगे। उनकी क्या औकात भला? वैसे भी
ये विकास में बाधक हैं। हटाने दीजिए उन्हें।’
‘मुझे क्या इंसान समझ रखा है? वे भले ही छोटी हैं, लेकिन मेरे ही सिस्टम
का हिस्सा हैं। उन्हें हाथ भी लगाकर देख लो।’
‘तो क्या कर लोगे, ऐ पहाड़?’ अब आदमी ने भी भोलेपन की केंचुली छोड़ दी है।
‘सरकार नाम की कोई चीज है कि नहीं! मैं उसके पास जाऊंगा। सुप्रीम कोर्ट
के पास जाऊंगा। पर तेरी साजिश सफल नहीं होने दूंगा।’
आदमी अब पूरे कमीनेपन के साथ हंसने लगा है। पहाड़ वाकई उससे भी ज्यादा भोला
निकला, जितना भोला इंसान ने उसे समझा था। हंसते हुए वहां से लौट आया है, वापस लौटने
के लिए।
आदमी को लग रहा है कि पहाड़ बेमतलब में अपनी चिंता में मरा जा रहा है। लेकिन
मूर्ख आदमी को पता नहीं कि पहाड़ अपने लिए नहीं, आदमी के लिए ही चिंतित है। पहाड़ न रहा
तो आदमी भी नहीं रहेगा।
(घोषणा : प्रख्यात व्यंग्यकार श्री ज्ञान चतुर्वेदी जी के एक व्यंग्य ‘आदमी और नदी’ से प्रेरित।)
(#aravalli_protest, #अरावली पर्वत खनन विरोध, #अरावली पर्वत सुप्रीम कोर्ट)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Thanks for your comment