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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

(Aravali) आदमी और पहाड़

By Jayjeet 

भोली सूरत वाला वह आदमी पहाड़ के नीच आकर खड़ा हो गया।

पहाड़ भी भोला-भाला। आदमी की तरह केवल सूरत से नहीं, सीरत से भी।

उस भोली सूरत वाले आदमी ने पहाड़ को दद्दू कहकर पुकारा तो पहाड़ स्नेह से भर उठा।

पहाड़ को लगा कि यह आदमी उसके साथ कुछ सुकून के पल बिताने आया होगा। कुछ दिन बंशी बजाएगा और चला जाएगा। लेकिन पहाड़ को पता नहीं कि आदमी के भीतर की अशांति इतनी बढ़ गई है कि पहाड़ के साथ कुछ पल बिताना ही काफी नहीं है। अब वह पूरे पहाड़ को ही अपने में बिताना चाहता है।

‘कैसे आए हो बेटा? तुम आज ज्यादा ही चिंतित दिख रहे हो?’

‘हां, दद्दू बहुत बेचैन हूं, चिंता खाए जा रही है,’ भोले आदमी ने और भी ऊपरी भोलेपन से कहा।

 ‘बेटा, यह पूरा पहाड़ तुम्हारा है, तुम्हारे लिए है, तुम्हारे बच्चों के लिए है। मेरी गोद में आओ और सबकुछ भूल जाओ।’

पहाड़ कितना भी अनुभवी क्यों न हो, पर मन से वह भोला ही है, इतना भोला कि वह आदमी के ऊपरी भोलेपन को ताड़ नहीं पाया। अपने भीतरी कमीनेपन को भोलेपन से किस तरह छुपाया जा सकता है, मार्केटिंग गुरुओं की साेबत में आदमी यह सीख गया है।

आदमी ने अपने दुखियारे चेहरे पर मासूमियत का मुल्लमा लगाते हुए कहा, ‘दद्दू, मैं आपके साथ समय बिताने नहीं आया हूं। मैं इस समय सबसे बड़े मसले विकास को लेकर चिंतित हो रहा हूं।’

‘विकास?’ पहाड़ को अचानक से कुछ समझ में नहीं आया। आखिर भोले आदमी ने भी तो अचानक से विकास की चर्चा छेड़ दी थी।

आदमी ने अपने कमीनेपन पर भोलेपन की परत गहरी करते हुए कहा, ‘देखो, दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है। मैं चाहता हूं कि हम भी विकास करें, आप भी विकास करें। इसमें आपका भी साथ चाहिए। सबका साथ सबका विकास से ही तो हम आगे बढ़ेंगे।’

पकाड़ ने विकास का नाम तो सुन रखा है, पर इस शब्द का असल मतलब नहीं जानता। आखिर, लाखों साल पुरानी परवरिश है। कैसे जान सकता है?

पहाड़ ने कहा, ‘बच्चे, विकास मतलब कहीं वही तो नहीं? पेड़ों को काट देना, नदियों की धाराएं मोड़ देना। मैंने सुना है, अब तो मेरे जैसे कुछ पहाड़ भी खोद दिए गए हैं!’

भोली सूरत वाला आदमी चौंक गया। उसने पहाड़ को वाकई भोला ही समझा था, मगर वह उसकी उम्मीदों से थोड़ा कम भोला निकला।

भोले आदमी ने तुरंत गियर बदला। ‘नहीं नहीं। आप भी कहां विकास विरोधी लोगों के झांसे में आ गए। हमने पेड़ काटे तो लगाए भी हैं। खूबसूरत कॉलोनियों में ताड़ के लगाए पेड़, हाईवे के किनारे बोगनबेलिया की झाड़ियां, अहा! शोभा देखते ही बनती है। बेचारी नदियां भी यूं ही बही जा रही थीं, साल-दर-साल। हमने अपनी इन माताआंे को बांधों में शानदार जगह दी है। जो बच गईं, उनके किनारों पर शानदार घाट बनाए। एक-दो नहीं, लाखों-करोड़ों लोग उनकी पूजा करने आते हैं। और हां, हमने आपके भाई-बंधुओं को तराशकर और सुंदर बना दिए हैं। आप यह सब नजारा देखोगो को आश्चर्य से भर उठोगे। दिखाऊं?’

उस भोली सूरत के आदमी ने पहाड़ के जवाब का इंतजार किए बगैर ही लैपटॉप खोल पावर पाइंट प्रजेंटेशन की तैयारी शुरू कर दी। वह भोली सूरत वाला आदमी आज के जमाने का शातिर आदमी है। उसे पता है कि झांसा देने का पहला स्टेप पावर पॉइंट प्रजेंटेशन ही होता है। ‘दद्दू देखना विकास की कहानी, आप भी कहोगे, वाह इंसान, ये तूने क्या कर दिया कमाल!’

पहाड़ ने उसे रोकते हुए कहा, ‘ये तू तेरी मशीन को रहने दे भाई। मेरे पास तो बहुत समय है, पर तेरा समय कीमती है। ये तू अपना समय क्यों बर्बाद कर रहा है? तू तो सीधे मुझे यह बता कि आखिर मुझसे क्या चाहता है।’

‘मेरे पास तो बहुत समय है’, यह सुनकर पहाड़ के भोलेपन पर आदमी का कमीनापन भीतर ही भीतर हंस पड़ा। पर ऊपर से गंभीर होने का दिखावा करके पूरी मासूमियम से कहा, ‘दद्दू, आपको अपनी कीमत नहीं पता, मैं बस यही बताने आया हूं। आप एक बार यह प्रजेंटेशन देख लीजिए। इसमें आपको बताएंगे कि आपके भीतर कितना खजाना छुपा हुआ है। बस थोड़ा-सा निकालेंगे और फिर देखिएगा, आपके सानिध्य में हम इंसान विकास की िकतनी ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे।’

‘अरे, तू मेरी ऊंचाई को खत्म करके अपनी ऊंचाई चाहता है?’ पहाड़ के सामने इंसानी भोलेपन की परत उतरती जा रही है। पहाड़ गुस्से में थोड़ा थरथरा भी रहा है। ‘तू मुझे खोदना चाहता है? नहीं, मैं तुझे हाथ भी नहीं लगाने दूंगा।’

‘डोंट वरी दद्दू, हम आपकी ऊंचाई को नहीं छेड़ने वाले। वे जो टुच्ची-सी पहाड़िया हैं ना, सौ मीटर से नीची, बस उन्हें खोदेंगे। उनकी क्या औकात भला? वैसे भी ये विकास में बाधक हैं। हटाने दीजिए उन्हें।’

‘मुझे क्या इंसान समझ रखा है? वे भले ही छोटी हैं, लेकिन मेरे ही सिस्टम का हिस्सा हैं। उन्हें हाथ भी लगाकर देख लो।’

‘तो क्या कर लोगे, ऐ पहाड़?’ अब आदमी ने भी भोलेपन की केंचुली छोड़ दी है।

‘सरकार नाम की कोई चीज है कि नहीं! मैं उसके पास जाऊंगा। सुप्रीम कोर्ट के पास जाऊंगा। पर तेरी साजिश सफल नहीं होने दूंगा।’

आदमी अब पूरे कमीनेपन के साथ हंसने लगा है। पहाड़ वाकई उससे भी ज्यादा भोला निकला, जितना भोला इंसान ने उसे समझा था। हंसते हुए वहां से लौट आया है, वापस लौटने के लिए।

आदमी को लग रहा है कि पहाड़ बेमतलब में अपनी चिंता में मरा जा रहा है। लेकिन मूर्ख आदमी को पता नहीं कि पहाड़ अपने लिए नहीं, आदमी के लिए ही चिंतित है। पहाड़ न रहा तो आदमी भी नहीं रहेगा।  

 (घोषणा : प्रख्यात व्यंग्यकार श्री ज्ञान चतुर्वेदी जी के एक व्यंग्य ‘आदमी और नदी’ से प्रेरित।)

(#aravalli_protest, #अरावली पर्वत खनन विरोध, #अरावली पर्वत सुप्रीम कोर्ट)

गुरुवार, 22 मई 2025

(Sweet name changed, PAK word removed ) मैसूर पाक नाम बदलने से खुश, मगर उठाया 'चीनी' का सवाल!

 

Sweet name changed, PAK word removed, मैसूर पाक, मैसूर श्री,
By A Jayjeet

जैसे ही खबर मिली कि मैसूर पाक से 'पाक' हटा दिया गया है, रिपोर्टर तुरंत पहुंच गया उससे क्विक इंटरव्यू लेने....
रिपोर्टर: कैसा लग रहा है आपके नाम में से 'पाक' जैसे 'नापाक' को हटाने से? अब आप 'मैसूर श्री' हो गई है।
मैसूर श्री: इस समय तो मैं अच्छा ही कहूंगी। अभी कुछ भी बुरा कहने का वक्त नहीं है, समझें!
(रिपोर्टर ने भी यह सुनकर राहत की सांस ली। बुरा कहती, तब भी रिपोर्ट कैसे करता!)
रिपोर्टर: ऐसा ना लग रहा कि अब जब आपके चाहने वाले आपको खाएंगे तो उनमें देशभक्ति का एक नया जज्बा, मतलब की देशभक्ति की नई भावना पैदा हो जाएगी?
मैसूर श्री: हां, पर शायद आधी-अधूरी।
रिपोर्टर: हें... क्या मतलब?
मैसूर श्री: मतलब यह कि इसमें 'चीनी' तो अभी भी है। उसका क्या करेंगे? (हालांकि उसने तुरंत ही यह स्पष्ट कर दिया था कि ये सवाल नहीं है, सिर्फ एक जिज्ञासा है।)
इतने में पास में बैठा मोती पाक (परिवर्तित नाम- मोती श्री) बोल उठा- इसका तो बड़ा सिंपल सॉल्यूशन है। सरकार को बस एक यही तो आदेश जारी करना है कि 'चीनी' को हर स्थिति में 'शक्कर' ही कहा जाएगा। चीनी को 'चीनी' कहना राष्ट्रविरोधी कृत्य माना जाएगा।
तो इस आम सहमति के बाद रिपोर्टर भी खुशी-खुशी वापस लौट गया।
हालांकि ऑफ द रिकॉर्ड बता दें कि उसी वक्त खोपरा श्री ने यह सवाल उठाने की कोशिश की थी कि देश में आधी से ज्यादा चीजें 'चीनी' हैं, उनका क्या करेंगे? लेकिन तमाम राष्ट्रवादी मिठाइयों ने ऐसे देशद्रोही सवाल पर उसका मुंह बंद कर दिया!!

Photo : कतिपय कारणों से मैसूर श्री ने अपनी खिंचवाने मना कर दिया। इसलिए उनकी जगह स्वर्ण भस्म श्री की तस्वीर दी जा रही है। वे एलीट वर्ग की राष्ट्रवादी विचारधारा से ताल्लुक रखती है।

 

 

शनिवार, 17 मई 2025

शीर्ष अदालत में केविएट दायर करेगी गटर... क्यों? जानिए उसी की जुबानी...

By Jayjeet

एक अदालत द्वारा फलाने मंत्री महोदय की भाषा को 'गटरछाप' बताने से गटर आहत हैं। पत्रकार ने गटर से सीधी बात की...
- पता चला कि आप आहत हैं? क्यों?
- आप जानते ही हैं कि हाई कोर्ट ने फलाना मंत्री के दिल, दिमाग, जुबान वगैरह-वगैरह की तुलना मुझसे की है। एक गैरतमंद गटर यह तुलना कैसे बर्दाश्त कर सकती है। आप करते?
- आपको भी तीन दिन हो गए? अब तक चुप क्यों रही?
- ठीक सवाल है। भले ही कुछ लोग अपने आप को कोर्ट से ऊपर मानते हो, लेकिन मेरे मन में माननीय कोर्ट के प्रति पूरा सम्मान है। मैं कड़वां घूंट पीकर बैठ गई कि चलो, मेरे ही बहाने मालिक लोग अपने शागिर्द के खिलाफ कुछ कार्रवाई कर लेंगे। तो मैं यह बेइज्जती भी बर्दाश्त कर लेती। आखिर सेना और महिलाओं के सम्मान के आगे इस बेइज्जती का कोई मोल नहीं है।
- आगे क्या करने का इरादा है?
- जैसे वह फलाना मंत्री शीर्ष अदालत में गया है, वैसे ही मैं भी शीर्ष अदालत में जा रही हूं। मैं वहां केविएट दाखिल करके सुप्रीम कोर्ट से आग्रह करुंगी कि किसी भी आलतू-फालतू मंत्री-संत्री या नेता वगैरह की तुलना मुझसे करने से पहले मेरा भी पक्ष सुना जाए। हर अदालत के लिए ऐसे निर्देश जारी करने का अनुरोध किया जाएगा। आखिर समाज में मेरी भी कोई प्रतिष्ठा है। मैं बगैर शपथ लिए अपने दायित्व निभाती हूं।

गुरुवार, 15 मई 2025

शुक्र है, इस्तीफा ना दिया। नहीं तो, नेता कसम, नेता लोगों पर से भरोसा ही उठ जाता!!!

By Jayjeet

आज सुबह जब अखबारों में पढ़ा कि मंत्री जी अभी इस्तीफा नहीं देंगे, उनके इस्तीफे पर सहमति नहीं बन सकी तो दिल को बड़ा सुकून मिला। कल दिनभर धुकधुकी लगी रही थी कि कहीं इस्तीफा ना दे दे या उनके आका लोग भावनाओं में बहकर बर्खास्त ना कर दे। अगर ऐसा हो जाता तो, नेता कसम, नेता लोगों पर से भरोसा ही उठ जाता।
फिर ये भी तो देखिए कि वे कितने दुखी हो लिए हैं। हर चैनल पर आ-आकर दुखी हो रहे हैं। शर्मिंदा हो रहे हैं। दुखी और शर्मिंदा होने का अगले 7 जनम का कोटा एडवांस में ही पूरा कर लिया है।
फिर, हर चैनल पर आकर कहना- वह तो मेरी बहन हैं। एक विधर्मी महिला को अपनी बहन बताना, वह भी बार-बार बताना, बताओ, अपनी आत्मा को कितना दुखी करके वे ये सब कह रहे होंगे। कितना कष्ट झेलना पड़ रहा होगा एक बेचारी मासूम आत्मा को। और हम हैं कि इस्तीफे पर अड़े हुए हैं। लानत है हम पर!!!
पुनश्च… इन्हीं मंत्री महोदय को जून 2014 में सांप ने डंस लिया था (खबर की लिंक कमेंट बॉक्स में देखें)। इसके अनर्थ आप अपने-अपने तरीके से निकालते रहिए। लेकिन खबरदार, जहर-वहर टाइप की कोई चलताऊ बात की। जिसने डंसा था, वह सांप करीब एक साल तक जिंदा रहा। बताया जाता है कि उसकी मौत उसके ही जहर से हुई है। (हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी!)

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

एक कविता देश के शूरवीर एंकरों, नेताओं और सोशल मीडिया के बहादुरों के नाम!




- जयजीत


चीखता-चिल्लाता एंकर बोला,

मुट्ठियां ताने नेता बोला,

वीर रस का कवि भी गरजा,

सोशल मीडिया वीर भी बरसा।


सब बोले , हे सरकार,

अब तो युद्ध जरूरी है!  


इस मौके पर दे दिया मैंने भी अपना ऑफर

मैं सरकार तो नहीं, मगर पत्रकार हूं 

कम से कम इतना तो फर्ज निभा सकता हूं

आपको बॉर्डर तक छोड़कर आ सकता हूं


एंकर भड़क उठा, बोला हड़ककर,

गंभीर घड़ी में कर रहे हो मजाक लपककर!

अगर मैं चला गया जंग के मैदान, दे दी जान 

तो चीख-चीखकर शहीदों की कौन सुनाएगा दास्तान ...? हें...


नेता बोला, हंसते-हंसते,

इस साइड हो या उस साइड

फितरत में हम एक हैं

हम लड़ते नहीं, बस लड़वाते हैं,

कभी जंग, कभी धर्म के झंडे फहराते हैं

चल हट स्साले, हमें काम करने दें,

हथियार नहीं, भाषण चलाने दें


वीर रस का वो कवि, चेहरे पर था वीभत्सता का बोलबाला

मेरे इस ऑफर पर बड़ी मासूमियत से बोला,

भाई, रणभूमि नहीं, मंच मेरी धरती है,

शहादत नहीं, कविता मेरी शक्ति है।

शहीदों की चिताओं पर प्यारे गीत सजाऊंगा,

वीरों के नाम मुट्ठियां तानकर वीरगान सुनाऊंगा!


और अब आई सोशल मीडिया वीर की बारी

मैंने कहा- चल, करते हैं बॉर्डर तक की सवारी!

उसने पूछा- क्यों?

ओह हो...लगता है फिर हो गया है शॉर्ट टर्म मेमोरी का शिकार

भूल गया जंग वाली सारी तकरार

पता नहीं, चाइना ने ऐसा क्या बोला कि

चाइनीज मोबाइल से ही 

फिर से चाइना के खिलाफ करने लगा खेला 


तो मॉरल ऑफ द पोयम...?

बाकी सब तो निभा रहे अपनी जिम्मेदारी,

नेता, एंकर, कवि और एफबी-एक्स की फौज सारी।

बस बचे रह गए सैनिक असली रणवीर,

सब पूछ रहे, कब आएगी इनकी भी बारी?


आ गई गर बारी तो हम भी पीछे नहीं रहेंगे

बजाएंगे खूब ताली और पीटेंगे जमकर थाली..

पक्का प्रॉमिस...!!!

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सोमवार, 14 अप्रैल 2025

हमें ऐसे ही स्टार्टअप मुबारक... AI, EV, Space का क्या करना...?

#abhinavarora #dhirendrakrishnashastriji #jayjeetaklecha

By Jayjeet

हाल ही में पीयूष गोयल ने भारतीय स्टार्टअप्स पर सवाल उठाए थे, चीनी स्टार्टअप्स की भूरि-भूरि तारीफ की थी। लेकिन वे भूल गए कि देश जैसा होता है, जैसी सरकारें होती हैं, जैसा राजनीतिक वातावरण होता है, स्टार्टअप्स भी वैसे ही होते हैं। अमेरिका और चीन भौतिकवादी देश हैं तो वहां AI और EV और Space जैसे स्टार्टप्स होंगे। हम विश्व गुरु हैं, अध्यात्म हमारे रौम-रौम में हैं तो हमारे स्टार्टअप्स जरा अलग होंगे... आध्यात्मिक टाइप के...
समझने के लिए साथ लगी तस्वीर देखिए। बायीं ओर एक बाल कथावाचक है। उसका स्टार्टअप हाल ही में शुरू हुआ है। प्रतिभासम्पन्न बालक है। उसके टैलेंट को नमन। दायीं ओर का स्टार्टअप अब 'यूनिकॉर्न' बन चुका है! यूनिकॉर्न मतलब? मूल परिभाषा के अनुसार जिस स्टार्टअप की वैल्यू एक अरब डॉलर को पार कर जाए। समझने के लिए समझ सकते हैं जो लाभ का सौदा बन जाए...
तो पीयूष जी, कृपया निराश ना हों... आप सियासत के जिस सेटअप के साथ काम करते हैं, वह भी ऐसे ही स्टार्टअप चाहता है... समझिए, धर्म के प्रति, जाति के प्रति आत्मगौरव सबसे बड़ी बात है। फिर बंगाल में वक्फ के नाम पर हो रही हिंसा हो या उप्र में किसी जातिवादी सेना का उग्र प्रदर्शन, हमें और आपको तो ऐसे ही स्टार्टअप्स का आनंद लेना चाहिए... ये स्टार्टअप्स रोजगार भले ना देते हों, लेकिन बेरोजगारी का एहसास भी नही करवाते। और क्या चाहिए?

मंगलवार, 25 मार्च 2025

Satire : व्यंग्य लिखने की अनुमति प्रदान करने बाबत अनुरोध-पत्र


 

प्रति,

श्री फलाना साहेब
व्यंग्य परीक्षण अधिकारी
नई दिल्ली
विषय : आदरणीय मंत्री महोदय के संबंध में व्यंग्य लिखने की अनुमति बाबत
महोदय
सेवा में दंडवत अनुरोध है कि मैं सरकार में कार्यरत आदरणीय मंत्री महोदय (नाम का उल्लेख) के संबंध/समर्थन में एक व्यंग्य लिखना चाहता हूं। मैं इस व्यंग्य में आपकी व्यंग्य लेखन नियमावली, 2025 के निम्नलिखित नियमों का पालन करने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता हूं।
- नियम क्रमांक 1, कंडिका ख(2) के तहत मैं ऐसे किसी भी शब्द का उपयोग नहीं करूंगा, जिससे मंत्रीजी की भावनाओं को ठेस पहुंचती हो। इसके उप-नियम (3) के तहत समर्थकों/लठैतों की भावनाओं का भी पूरा खयाल रखूंगा।
- नियम क्रमांक 2 के 'भाई-भतीजवाद' खंड, कंडिका ग (3) के तहत मैं ऐसे किसी भी प्रकरण की बात नहीं करुंगा, जो यह बताता हो कि उन्होंने नियमों का उल्लंघन करके अपने परिवार के कितने सदस्यों को कितनी हेक्टेयर जमीन दिलवाने और कितने अयोग्य रिश्तेदारों को नौकरियां दिलवाने में सहायता की।
- नियम क्रमांक 4, कंडिका ख (2) के तहत मैं उनके द्वारा किए गए किसी भी दलबदल पर कोई टिप्पणी नहीं करुंगा, तदनुसार उनके प्रति 'गद्दार' जैसे असंसदीय शब्द का इस्तेमाल भी नहीं करंगा। ऐसे शब्द या इसी तरह के ऐसे शब्द जिससे इस प्रकार का भाव अभिव्यक्त होता हो, का उपयोग होने पर मैं अपने खिलाफ देश-द्रोह का मामला दर्ज किए जाने की सहर्ष अनुमति देने को तैयार रहूंगा।
- नियम क्रमांक 3, कंडिका घ (1) के तहत मैं उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उल्लेख नहीं करुंगा। उनके खिलाफ 23 मामलों की जो जांच लंबित है, उस संदर्भ में मैं 'जांच' शब्द का भी उपयोग नहीं करुंगा।
- नियम क्रमांक 1, कंडिका ख(6) के तहत मैं उस नियम का पूर्णरूपेण अनुपालन करुंगा, जिसमें मंत्रीजी की प्रशंसा में 10 पंक्तियां लिखना अनिवार्य हैं।
कृपया मुझे आदरणीय उक्त मंत्री महोदय के संबंध में व्यंग्य लिखने की सशर्त अनुमति प्रदान करने की कृपा करें।

भवदीय
ढिकाना कुमार
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#kunal kamra, #कुणाल कामरा, #व्यंग्य, #satire, #जयजीत अकलेचा

शुक्रवार, 22 नवंबर 2024

चिंदी चिंतन... करप्शन पर बंटेंगे, तो मिटेंगे...!

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By Jayjeet Aklecha/ जयजीत अकलेचा

हमारे राजनीतिक दल नूरा-कुश्ती खेलने में माहिर हैं। एक ने धर्म को पकड़ रखा है तो दूसरे ने जाति को...। हम यानी मासूम रियाया उनके हथियार बनकर ही खुश हैं।
अब गौतम अडाणी का मामला आया है तो यह कांग्रेस और भाजपा में बंट गया है... कोशिश यही है कि यह किसी तरह राजनीति की भेंट चढ़ जाए...। भ्रष्टाचार का इशू ही ना रहे... बस अडाणी ही अडाणी रहे। एक तरफ राहुल बाबा अडाणी के नाम पर हमलावर रहें... और विरोधियों को राहुल पर हमले के मुद्दे तो मिल ही जाते हैं। तो बस अडाणी वर्सेस राहुल वर्सेस मोदी वर्सेस कांग्रेस वर्सेस भाजपा वर्सेस (बीच बीच में केजरीवाल) वर्सेस फलाना वर्सेस ढिकाना... हमारे तमाम नेताओं को यही पसंद है, और हमें तो और भी ज्यादा पसंद हैं।
पर जरा एक चिंदी चिंतन कर लेते हैं...
आरोप है कि अफसरों को 2,200 करोड़ रुपए रिश्वत में दिए गए। क्यों? ताकि वे महंगी बिजली खरीद सकें। किस पैसे से? हमारे पैसे से!
अगर रिश्वत में ही इतना पैसा दिया गया है (हालांकि आरोप है) तो महंगी बिजली खरीदने में कितने अरब वारे-न्यारे हुए होंगे या भविष्य में होंगे? सोचिए! पर हमें कुछ फर्क पड़ता है? नहीं जी। हमें तो बस चिंता रहती है, बंटेंगे तो कट ना जाएं और संविधान लूटकर कोई हमें आरक्षण से विहीन ना कर दें....।
हां, बीच-बीच में हमें फ्रीबीज की चिंता जरूर होती है। कितने हजार करोड़ रुपए उन पर खर्च हो रहे हैं...। ये भी हमारे नेताओं की एक अलग तरह की बदमाशी है..!!! (शायद कई सहमत ना होंगे, मगर करप्शन वाली से बेहतर है...!)
पुनश्च... भ्रष्टाचार पर बंटेंगे तो मिटना तय है, एक ना एक दिन...! और शायद, हमने ठान लिया है...!!!

रविवार, 28 जुलाई 2024

इन सड़कों में ही हमारा ‘कल’ छिपा है, इस इनोवेशन के लिए सैल्यूट...!

 

By Jayjeet

इन दिनों हम सबमें इतनी नकारात्मकता भर गई है कि कई असल इनोवेशन भी हमारी नुक्ताचीनी से बच नहीं पाते हैं। हम कुछ न कुछ खामियां ढूंढ़ते रहते हैं। अब इस सड़क को या इसी तरह की और भी सड़कों को देखिए। जबसे बारिश का सीजन आया है, मेरे कान यह सुनते-सुनते पक गए हैं कि देखो, कैसे पहली ही बारिश में सड़क गड्ढों में बदल गई। लेकिन सच तो यह है कि ये असल में एक इनोवेशन है, दूरदर्शिता की अनुपम मिसाल। इसमें ही हमारा कल, हमारा सुखद भविष्य छिपा है।
थोड़ा पीछे चलते हैं। कुछ माह पहले ही हम सब लोग गर्मी से त्राहिमाम कर रहे थे। जमीन के भीतर घटते भू-जल स्तर पर चिंता जताई जा रही थी। स्वाभाविक भी था। हर जगह कांक्रीटीकरण होने से भला पानी जमीन के भीतर जा भी कैसे सकता था?
लेकिन धन्य हो हमारे देश के इंजीनियर-अफसर-ठेकेदार। उन्होंने इस चिंता को समझा और इस तरह वे एक अनूठा कॉन्सेप्ट लेकर आए। इस कॉन्सेप्ट के अनुसार ठंड से लेकर गर्मी तक सड़कें केवल सड़क का काम करेंगी और बारिश होते ही ग्राउंड वॉटर रिचार्जेबल रोड्स में तब्दील हो जाएंगी।
कोशिश यही है कि बारिश की एक भी बूंद बर्बाद ना हो और इसलिए इन सड़कों के निर्माण के दौरान ही एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। तकनीक यह है कि बारिश की पहली बूंदों का स्पर्श होते ही इनमें लगे सेंसर काम करने लगें और वे सड़क को तुरंत गड्ढों में तब्दील कर दें। ऐसी सड़कें पूरे बारिश के महीने में इसी तरह पानी से भरी रहेंगी और जमीन के भीतर पानी की आपूर्ति करती रहेंगी। इस तरह ये हमारा कल सुरक्षित करने का काम करेंगी।
सवाल यह है कि बारिश के बाद क्या होगा? इसकी भी एक स्व-चालित प्रक्रिया है। नया टेंडर पास होगा और फिर ऐसी सड़कें बनाई जाएंगी जो गर्मी तक सड़क जैसा आभास देंगी। ये बारिश होने तक सड़क की तरह काम करती नजर आएंगी, और बारिश की पहली ही बूंदों से हमारे भविष्य को सुरक्षित करने में जुट जाएंगी।
तो जब भी आपको सड़क पर पानी से भरा कोई बड़ा गड्‌ढा नजर आए तो वर्तमान पर दुख जताने के बजाय यह सोचें कि हमारा-आपका भविष्य कितना सुरक्षित है....
ऐसे क्रिएटिव काम करने वालों को सैल्यूट! आप भी कीजिए!!
#monsoon2024 #potholes # जयजीत अकलेचा
(तस्वीर प्रतीकात्मक है, जो हर शहर की अपनी जैसी हर सड़क का प्रतिनिधित्व करती है।)

शनिवार, 25 मई 2024

अरे, अभी तो गर्मी शुरू हुई है....

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By Jayjeet Aklecha/ जयजीत अकलेचा

इस समय हर शहर, हर कस्बे, हर जगह, हर कोने से एक ही बात उठ रही है- गर्मी बहुत है...।
क्या वाकई बहुत है?
नहीं जी। अभी भी इतनी नहीं है कि हम बारिश की चंद बूंदों के बाद भी इसे याद रख सके...
इतनी भी नहीं है कि कटते पेड़ों की खबरें हमें एंग्जाइटी की हद तक बेचैन कर सके...
इतनी भी नहीं है कि यह हमें हम धर्म, जाति के बजाय पर्यावरण के मुद्दे पर वोट देने को विवश कर सके...
इतनी भी नहीं कि यह नेता लोगों को हमें सुरक्षित पर्यावरण की गारंटी देने के लिए मजबूर कर सके...
तो देखिए, अब भी गर्मी इतनी कहां है?
हमारी-आपकी कॉलोनी में जो जगह बगीचे के लिए रखी गई थी, वहां धर्म के नाम पर कब्जा देखकर क्या हमें गुस्सा आता है?
नया मकान खरीदते हुए क्या हम अपने बिल्डर से यह पूछते हैं कि हरियाली के नाम पर सैकड़ों गैलन पानी पीने वाली कथित हरी घास और केवल ताड़ के पेड़ क्यों?
अगर हम किसान हैं तो कभी खुद से पूछते हैं कि अपने खेतों में दूर-दूर तक एक भी पेड़ क्यों नहीं? या कभी थे तो वे आज कहां हैं?
क्या बड़े-बड़े आर्किटैक्ट खुद से पूछते हैं कि ठंडे यूरोपीय देशों की नकल करने के फेर में वे यह कैसे भूल गए कि भारत जैसे गर्म देशों की इमारतों में इतने शीशों का क्या काम?
तो सूरज देवता, आपसे उम्मीद है कि आप गर्मी का प्रकोप जारी रखेंगे...।
44, 45, 46, ...! इसी से हम घबरा जाएंगे तो 50-55 को कैसे झेलेंगे? ये तो मैच से पहले की नेट प्रैक्टिस है, या कह सकते हैं कयामत की पूर्व संध्या!
आप तो अभ्यास करवाइए...! यह जरूरी है...!!!
और, इतनी भर गर्मी में भी मुझे एक गाना याद आ रहा है- डीजे को भी समझा दो प्यारे म्यूजिक गलती से रुक ना पाए, क्योंकि अभी तो पार्टी शुरू हुई है...!!!

शनिवार, 16 मार्च 2024

गब्बर, चुनाव और साम्बा की होशियारी...!

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( Disclaimer: होली पर गब्बर घिस-घिसकर बहुत घिसा-पिटा हो गया है, मगर फिर भी ऐसे घिसे-पिटे सब्जेक्ट वैसे ही चलते रहते हैं, जैसे घिसे-पिटे नेता...। तो इसे पढ़कर वैसे ही भूल जाइए, जैसे हम इलेक्टोरल बॉन्ड के महाघोटाले को भूल जाएंगे...)
  

By Jayjeet Aklecha

गब्बर को गलतफहमी है कि 'होली कब है, कब है होली' जैसा कुछ कहने के बजाय 'चुनाव कब है, कब है चुनाव' कहने से उसे चुनाव का टिकट मिल जाएगा। टिकट दल बदलने से मिलता है, जुमले बदलने से नहीं। और उसे इस बात की और भी गलतफहमी है कि डकैत होना उसकी एडिशनल क्वालिफिकेशन है। डकैत की ड्रेस पहनने भर से टिकट मिल जाता तो इलेक्टोरल बॉन्ड की डकैती की जरूरत ही क्यों होती! सोचने की बात है...! गब्बर ने अपनी जात नहीं बताई... डकैत तो डकैत होता है। उसकी क्या जात और क्या पात? लो, ऐसी नैतिकता का ऐसा झंझट तो अपन वोटर लोग भी नहीं पालते और ये डकैत होकर पाले हुए हैं। शायद, इसीलिए नेताओं के बीहड़ों में इसके डकैतपने की कोई औकात नहीं है। तो टिकट कैसे मिलेगा, कैसे मिलेगा टिकट? भाईसाब, रामगढ़... मोबाइल में घुसे पड़े नल्ले साम्भा के मुंह से कुछ फूटा...। पहाड़ी की चोटी पर अब वह केवल नेटवर्क के मारे ही बैठता है। क्याssssss? रामगढ़ssssss। रामगढ़ का कनेक्शन बताइए और टिकट पाइएsssssssss। साम्भा भी उतना ही जोर से चिल्लाया। वाह, साम्भा के मुंह से पहली बार कोई कायदे की बात फूटी है। टीवी चैनलों पर न्यूज टाइप की चीजें देखकर आदमी ज्ञानी भी हो लेता है... मॉरल ऑफ द स्टोरी फ्रॉम द ग्रेट साम्बा...जिसके पास धेले का भी काम नहीं, वह न्यूज चैनलों पर एंटरटेनमेंट जरूर करें। बीच-बीच में गजब का ज्ञान भी मिल जाता है। चलते-चलते... कांग्रेस तो दो बोरी गेहूं के बदले ही टिकट देने को तैयार है, मगर साम्भा ने चेताया, भाई साब ले मत लेना, अभी तो आप जमानत पर बाहर है। वह भी जब्त हो जाएगी। एक तो कांग्रेस, ऊपर से ईडी का झमेला...। (देखो तो जरा साम्भा को, नीम और करेला की कहावत का इल्म भी आ गया... )

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बुधवार, 14 जून 2023

यथा जनता तथा नेता!


Jayjeet Aklecha/जयजीत अकलेचा


सभी विधर्मी पार्टियों को 'काफ़िर' भाजपा का शुक्रगुजार होना चाहिए। चुनाव जीतने का सभी को बड़ा आसान-सा नुस्खा थमा दिया है। कहीं मंदिर चले जाओ, कहीं घाट पर आरती उतार आओ। कभी मंदिरों का निर्माण करवा दो, कभी किसी देवता के नाम पर करोड़ों रुपए का परिसर बनवा दो। लैटेस्ट आकर्षण भांति-भांति के बाबाजी हैं। किसी बाबाजी के चरणों में गिर जाओ, कभी उनसे अपने क्षेत्र में कथा करवा लो। सभी बाबाजी पार्टी लाइनों से ऊपर उठे हुए हैं। वैसे पार्टियों के बीच की ही लाइनें मिट गई हैं तो ये बेचारे बाबा बेमतलब में बंटकर अपनी मोह-माया का नुकसान क्यों करें!

लिहाजा; शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ग्लोबल वार्मिंग एवं एआई के संभावित खतरों, बढ़ते भ्रष्टाचार आदि बेकार के मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने की अब कतई जरूरत नहीं है।
वैसे भी पांडालों में प्रसाद मिल ही रहा है और सरकारों के दरवाजों पर रेवड़ियां। जनता का पेट तो वैसे भी छोटा होता है। उसे और क्या चाहिए!
भाड़ में जाए आर्थिक विकास और वैज्ञानिक तरक्की। हमारे पास अपना खुद का एक अदद मोबाइल फोन तक नहीं है, तो क्या हुआ? चाइना बाजू में ही है। ढंग का ऑपरेटिंग सिस्टम तक नहीं है। कोई बात नहीं। अमेरिका पक्का मित्र है।
हां, बस चिंता है तो भारत के विश्व गुरु बनने की। लेकिन इसकी भी चिंता ना करें। एक न एक दिन कोई न कोई सरकार भारत देश का नाम बदलकर 'विश्व गुरु' कर ही देगी। तो यह चिंता भी खत्म!

शनिवार, 5 नवंबर 2022

उफ!!! ये तो भारी सदमे वाली खबर है...!!





By Jayjeet
यह ऐसी सदमा पहुंचाने वाली खबर है, जिसने मुझे लिखने को मजबूर कर दिया। दो कर्मचारियों ने 1500 रुपए की रिश्वत ली। लोकायुक्त संगठन ने योजना बनाकर उन्हें पकड़ा, आठ साल तक कमरतोड़ मेहनत की और अंतत: सजा दिलवाकर ही चैन लिया। आखिर इन कर्मचारियों ने ऐसे क्या पाप किए थे, जो वे इस सजा की पात्र थीं? मेरी नजर में उनके ये तीन महापाप हैं :
1. रिश्वत ली भी तो कितनी? महज 1500 रुपए की। अगर आप इतनी टूच्ची-सी रिश्वत मांगोगे या लोगे तो क्या संदेश जाएगा? यही ना कि कितनी छोटी औकात है? आपकी छोटी औकात ही हमारी सरकारी जांच एजेंसियों की हिम्मत देती है, और इतनी हिम्मत देती है कि केस को मुकाम तक पहुंचाकर ही दम लेती है।
2. ठीक है, आपने रिश्वत ली। पर पकड़ में क्यों आ गई? इन दोनों अनाड़ियों को इतना भी पता नहीं था कि रिश्वत लेना जुर्म नहीं है, पकड़ में आना जुर्म है। अगर रिश्वत लेना नहीं आता था कि तो अपने वरिष्ठ अफसरों से सीख लेतीं। वरिष्ठ अफसर आखिर होते किसलिए हैं! शायद इन दोनों ने अपने अफसरों को कॉन्फिडेंस में ही नहीं लिया होगा। इतना सेल्फ कॉन्फिडेंस ठीक नहीं।
3. चलिए, ढंग से रिश्वत लेना नहीं सीखा, पर देना भी नहीं सीखा? क्या ये खुद को आम लोगों से ऊपर समझती थीं? खुद को आम लोग समझतीं तो शायद रिश्वत देने में भी भरोसा करतीं। पकड़ में आ जाने भर को इन्होंने अपना खेल खत्म समझ लिया होगा, जबकि पकड़ में आ जाने के बाद ही असली खेल शुरू होता है (अब क्या कहें, ये देश के सिस्टम को भी नहीं जानती, चली रिश्वत लेने!)। तो बेचारे लोग टापते रहे। और फिर क्या करते! खीजकर सजा दिलवाने में जुट गए। इसीलिए ऊपर लिखा, अपने अफसरों से सीखतीं। बड़े अफसर आखिर होते ही इसलिए हैं।
तीन-तीन बड़ी-बड़ी गलतियां कीं और सजा केवल चार साल? ये तो सिस्टम के साथ बहुत नाइंसाफी है। इसलिए मुझे ज्यादा सदमा लगा। मैंने पिक्चरों में देखा है (पता नहीं क्या सच है) कि कई बार जज साहब सबसे बड़ी सजा देते हुए अपने पेन की निब तोड़ देते हैं। इन दोनों को वैसी ही निब-तोड़ सजा मिलनी चाहिए थी...इसी लायक थी। अगर ऐसी सजा मिलती तो बाकी टुच्चे रिश्वतियों के लिए मिसाल बनती।
(सीखिए, सीखने के लिए कोई रिश्वत ना देनी पड़ती। परसों की ही खबर है। यूपी में 5 लाख रुपए की रिश्वत के दोषी पाए गए DSP को डिमोट करके इंस्पैक्टर बनाया गया है। केवल डिमोट किया गया, 1500 रुपए की टुच्ची रिश्वतखोरों की तरह जेल ना भेजा गया क्योंकि रिश्वत की रकम देखिए। अगर 5 के आगे एक-आध जीरो और लग जाता तो हो सकता, SP पद पर प्रमोट कर दिए जाते!)

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