शनिवार, 28 मार्च 2026

कूटनीति बच्चों का खेल नहीं, मगर कभी-कभी बड़ों की गलतियों को बच्चे भी संभाल लेते हैं!!

By Jayjeet

दायीं तरफ की तस्वीर भारत स्थित ईरानी दूतावास ने जारी की है। भारत सरकार की शुरुआती कूटनीतिक गलती को उन लोगों ने, खासकर उन बच्चों ने ढक लिया, जिन्होंने महज अपने धर्मगुरु की हत्या के विरोध में ईरान की सहायता करने की कोशिश की थी। लेकिन इस कवायद का कितना व्यापक असर हुआ, इसका अनुमान इस तस्वीर को देखकर लगाया जा सकता है। ईरानी दूतावास ने इस तस्वीर को जारी करते हुए लिखा - 'हम आपकी दयालुता कभी नहीं भूलेंगे।'
ये उसी कौम के बच्चे हैं, जिन्हें देशभक्ति के ठेकेदार अक्सर संदेह की नजरों से देखते हैं। ये ज्यादातर उसी राज्य के बच्चे हैं, जहां की जमीन को तो ये ठेकेकार भारत का अभिन्न अंग मानते हैं, जो है भी, मगर अक्सर वहां के रहवासियों को नहीं।
आज अगर भारत लॉकडाउन लगाने की नौबत से बचा हुआ है तो इसकी एक वजह ईरान की यह इमोशनल जियोपोलिटिक्स भी है, जिसके तहत उसने भारतीय नागरिकों व बच्चों की उसके प्रति उदारता को सिर माथे लेकर होर्मुज से जहाजों को निकलने की अनुमति दी है (बेशक, यह अकेली वजह नहीं है)। इसने यह भी दर्शाया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े फैसलों में मजहब और घरेलू राजनीति को किनारे पर रखा जाता है। ईरान ने जिन चुनिंदा देशों के जहाजों को निकलने की अनुमति दी है, उनमें से तीन (भारत, चीन और रूस) इस्लामिक देश नहीं हैं।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान पर अमेरिकी हमले और खामनेई की मौत के बाद छह दिन तक भारत सरकार द्वारा चुप्पी साधे रखने की एक वजह देश की घरेलू राजनीति भी रही। हो सकता है, यह बात पूरी तरह सच न हो, मगर हर जगह धर्म के साथ फ्रंटफुट पर खेलने वाले हमारे कर्णधारों पर लगने वाले ऐसे आरोप से इनकार करते भी नहीं बनता है।
उम्मीद है, आज संकट में देश से 'टीम इंडिया' की तरह बर्ताव करने का आह्वान करने वाले और उनके सपोर्टर इन बच्चों के योगदान को संकट के बाद भी उसी तरह याद रखेंगे, जैसा याद रखने का वादा ईरान ने किया है।

रविवार, 22 मार्च 2026

कितनी आसान हो गई है देशभक्ति!! और हां, गद्दारी भी!!!

By Jayjeet

मैं इसीलिए मौजूदा कर्णधारों का एक तरह से कद्रदान हूं कि उन्होंने देशभक्ति को इतना आसान बना दिया है। अब कोई भी बड़ी आसानी से देशभक्त बन सकता है, और हां, चाहें तो गद्दार भी। धन्य है ऐसे प्रभुओं पर...!
कोई भी धुरंधर देखकर और उसकी तारीफ कर देशभक्त बन सकता है!
कोई भी सिर्फ और सिर्फ, वंदे मातरम गाकर देशभक्त बन सकता है!
और हां, गर्मियां आने वाली हैं... तो कोई भी रुहअफ्जा न खरीदकर स्वयं को देशभक्त घोषित कर सकता है।
वाकई, कितना आसान है ये सब करना!
हां, वैधानिक चेतावनी! कोई भी भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म, धर्मोन्माद वगैरह-वगैरह पर सवाल न उठाएं। आपकी अच्छी-खासी देशभक्ति पर सवाल उठ सकते हैं!!!
पुनश्च... मगर सोनम वांगचुक पर यह लागू नहीं होता। उनसे पूछिएगा तो वे बताएंगे कि इस देश में असल देशभक्त को स्वयं को देशभक्त साबित करना वाकई कितना मुश्किल काम है।

#dhurandhar #RoohAfza #Jayjeet

बुधवार, 4 मार्च 2026

प्रदर्शनों पर हम इतने असहज क्यों हो जाते हैं?

Why do we get so uncomfortable with protests?
By Jayjeet

खामनेई के प्रति मेरी कोई विशेष सहानुभूति नहीं है। दरअसल, ट्रम्प, नेतन्याहू से लेकर पुतिन और खामनेई तक, सारे ही अलग-अलग प्रकार से मानवीय मूल्यों के संहारक रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद जो लोग खामनेई की मौत के खिलाफ भारत में प्रदर्शन कर रहे हैं, उनके प्रति मेरी सहानुभूति है। यह सहानुभूति इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि इन प्रदर्शनों को कुछ अज्ञानियों ने देशभक्ति और गद्दारी से जोड़ दिया है। आखिर, हम हर प्रदर्शन को देश के साथ कैसे जोड़ सकते हैं? इससे हम जाने-अनजाने देश की ताकत को हल्का या उसके आत्मविश्वास को कम नहीं कर देते हैं? प्रदर्शन का अधिकार चाहे वह किसानों, मजदूरों या कर्मचारियों को हो, किसी समिट में हो या किसी धार्मिक नेता की हत्या के खिलाफ हो, एक देश में जीवंत लोकतंत्र का प्रमाण भी होता है।
इससे पहले इराक हो, लीबिया हो, सीरिया हो, यमन हो, सोमालिया हो या अफगानिस्तान, आपके दिमाग में जो-जो नाम भी आ रहे हैं, सब गिन लीजिए। वहां कोई विदेशी शक्ति, खासकर अमेरिका केवल इसलिए दखल दे पाई, क्योंकि उन देशों में असल में कोई लोकतंत्र नहीं रहा। वेनेजुएला में निकोलस मादुरो भी इसलिए पकड़ में आ गए, क्योंकि वहां भी उन्होंने लोकतंत्र को मजाक बना रखा था। सिर्फ यूक्रेन को एक अपवाद माना जा सकता है। बहुत पीछे जाएं तो पूर्वी बांग्लादेश। वहां अगर वास्तव में उस वक्त कोई डेमोक्रेटिक रेजिम होता तो क्या भारत दखल दे पाता? दखल की वजह ही नहीं बन पाती।
दरअसल, सच्ची लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव किसी भी साम्राज्यवादी ताकत को दखल देने का एक अच्छा बहाना दे देता है। उसे पता होता है कि वहां उसका सामना केवल सत्ता में बैठे अधिनायकवादी या धार्मिक तंत्र से होगा, क्योकि जनता में तो प्रतिरोध की ताकत है नहीं। अगर इससे पहले ईरान में महिलाओं और युवाओं के जो प्रदर्शन हुए, उन प्रदर्शनों को बेरहमी से दबाया नहीं जाता, प्रदर्शनकारियों से शांति से बात होती, उनकी भावनाओं को समझा जाता तो ईरान की स्थिति कुछ अलग होती और हो सकता है, आज जंग जैसा माहौल भी न होता।
दूसरी बात, अगर किसी समुदाय का धार्मिक नेता मारा गया है तो उस पर प्रदर्शन करने या उसका मातम मनाने पर सवाल उठाने का भी कोई औचित्य नहीं है। हमारे यहां कुछ तथाकथित धार्मिक संतों को तो दुष्कर्मों के आरोपों में सजा तक हुई है, लेकिन उनके भक्त गाहे-बगाहे उनके जन्मदिवस मनाते रहते हैं। जब हम उन भक्तों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से नहीं रोकते हैं, तो खामनेई तो किसी भारतीय कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए मुजरिम नहीं थे। आतंकवाद को लेकर उन्हें अमेरिका के चश्मे से देखना भी ठीक नहीं। आखिर, ईरान कभी भी भारत के दुश्मन आतंकी समूहों के साथ नजर नहीं आया। केवल इसलिए कि खामनेई मुस्लिम थे और उनकी हत्या पर मातम मनाने वाले भी मुस्लिम, इसलिए उनका विरोध किया जाए? यह रवैया घोर असंवेदनशील, अलोकतांत्रिक और भारत की उदार सांस्कृतिक परंपरा का विरोधी है।
पुनश्च... हाल ही में कुछ लोग एक इंटरनेशनल समिट में शर्टलेस प्रदर्शन करते हैं तो उसे हम देश की प्रतिष्ठा से जोड़ देते हैं, मानो वहां भाग लेने वाले प्रतिष्ठित विदेशियों को इससे पहले यह पता ही नहीं होगा कि भ्रष्टाचार, जातिवाद, धार्मिक असहिष्णुता जैसे मसलों पर हमारा रिकॉर्ड कितना शानदार है! हमारी इज्जत के उक्त सारे मानक उनके पास पहले से होंगे। पर हो सकता है, उस प्रदर्शन से उन्हें इस बात का इल्म हुआ हो कि यहां लोकतंत्र की स्थिति इतनी भी खराब नहीं है।