By Jayjeet Aklecha
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू उन कुछ चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जो पारंपरिक नेतागीरी वाली बिरादरी से थोड़े हटकर दिखाई देते हैं। पहनावे में भी और विजन को लेकर भी। उन्होंने दिखाया है कि धर्म और जाति की घृणित राजनीति के बीच भी इनोवेशन, नवाचार और विजन को राजनीतिक हथियार के तौर पर साधा जा सकता है। ऐसे में उनकी सरकार द्वारा दंपतियों को तीन और चार बच्चे पैदा करने पर प्रोत्साहन (पढ़ें प्रलोभन) देने वाली घोषणा बेहद निराशाजनक है।
इससे पहले आरएएस प्रमुख भी कई बार कह चुके हैं कि देश के हर परिवार को तीन बच्चे पैदा करना चाहिए। इन नेताओं की राजनीति के उकसावे में आकर अन्य नेतागण भी बच्चे पैदा करने के लिए रेवड़िया बांटने लगे तो क्या आश्चर्य?
नायडू की दलील है कि भविष्य में जनसंख्या का संतुलन बनाए रखने के लिए समाज को जन्म दर बढ़ाने की दिशा में काम करना होगा। बेशक, यह उन देशों के लिए जरूरी है, जहां पहले से ही बेहद कम आबादी है, जहां काम ज्यादा है, हाथ कम हैं। जहां सैकड़ों एकड़ जमीन पड़ी है, लेकिन उन्हें जोतने वाला कोई नहीं है। लेकिन भारत, खासकर आंध्रप्रदेश को लेकर उनकी चिंता की बुनियाद आधे-अधूरे सच पर खड़ी है।
अनुमानों के अनुसार भले ही भारत में जन्म दर घट रही है (और यह नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए हाल के वर्षों तक कठोर प्रयास किए गए हैं), लेकिन इसके बावजूद आबादी पर सबसे सटीक आकलन करने वाली संस्था यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन की ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024' की रिपोर्ट भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में इसी दर से घटती रफ्तार के बावजूद भारत की आबादी को स्थिर होने में अभी भी 35 से 40 साल लग जाएंगे और यह करीब 170 करोड़ के आसपास पहुंचकर स्थिर होगी। फिर वहां से धीरे-धीरे कम होनी शुरू होगी, बशर्ते मौजूदा जन्म दर में बढ़ोतरी न हो।
आज 145 करोड़ की आबादी में ही देश की सांसें फूल जाती हैं। एक बड़ी आबादी के पास काम नहीं है। एक बड़ी आबादी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो रही है। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज मुहैया करवाना पड़ रहा है। ऐसे में मौजूदा जन्मदर के हिसाब से जब हम 170 करोड़ पर पहुंच जाएंगे तब क्या होगा? और अगर हमारे लोग ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले प्रलोभन में आ गए, तब?
नायडू अपने फैसले के समर्थन में दक्षिण कोरिया जैसे देशों का हवाला देते हैं, जहां की आबादी तेजी से घट रही है। तथ्य यह है कि अकेले आंध्र की आबादी पूरे दक्षिण कोरिया देश की आबादी से ज्यादा है। नायडू को पता होगा कि उनकी राज्य की आबादी को भी स्थिर होने में कम से कम 10 से 15 वर्ष लग जाएंगे। इस अवधि के बाद भी अकेले आंध्र प्रदेश की आबादी 6 करोड़ से ज्यादा ही होगी। प्रति व्यक्ति आय,जीवनशैली और कई तरह की सुविधाओं को लेकर दक्षिण कोरिया केवल आंध्र प्रदेश ही नहीं, पूरे भारत से आगे है। तो पहले कोशिश वह देने की होनी जानी चाहिए जो ये विकसित देश दे चुके हैं- अपने लोगों को बेहतर जीवनशैली।
इसलिए हमारे नेताओं से करबद्ध आग्रह है कि इस तरह की बेतुकी बात करने या फैसले लेने से पहले काम करने के इच्छुक हर व्यक्ति को काम मिल सके, यह सुनिश्चित कीजिए। लगातार बढ़ती गर्मी के बीच हर परिवार को कूलर के लिए पानी तो छोड़िए, उसे शुद्ध पेयजल नसीब हो सके, यह सुनिश्चित कीजिए। एक झटके में ही एक शहर में गंदे पानी से 30-35 लोग मर जाते हैं और नेता लोग घंटा बजाते हुए चल देते हैं। देश के करोड़ों लोगों को बहुत सी बुनियादी चीजें मुहैया करवाना बाकी है। पहले वह करवाइए, फिर जन्म दर की चिंता कीजिए।
फिर एक सवाल और भी है, जो कहीं ज्यादा विचारणीय है। आखिर ये बच्चे पैदा कौन करेगा? एक स्त्री ही ना? मतलब, बस वह अपनी देह को कुर्बान करे, ताकि हमारा समाज या हमारा देश चलता रहे! बल्कि, हकीकत में आपकी राजनीति चलती रहे। बेशक, मां बनना एक विशिष्ट आत्मीय गौरव की बात होती है (जिसका वर्णन शायद स्त्री ही कर सके)। लेकिन आर्थिक प्रलोभन देकर उसे बच्चे जनने की मशीन बनाना एक बिल्कुल अलग बात है, अमानवीयता के बेहद करीब।
तो जब कोई नेता तीन या चार बच्चे पैदा करने का प्रलोभन या ज्ञान दें, तो उससे यह सवाल भी पूछना बनता है कि आखिर ये पैदा कहां से होंगे? ये सवाल कम से कम देश की स्त्रियों को तो अवश्य करने चाहिए।




