By Jayjeet
दायीं तरफ की तस्वीर भारत स्थित ईरानी दूतावास ने जारी की है। भारत सरकार की शुरुआती कूटनीतिक गलती को उन लोगों ने, खासकर उन बच्चों ने ढक लिया, जिन्होंने महज अपने धर्मगुरु की हत्या के विरोध में ईरान की सहायता करने की कोशिश की थी। लेकिन इस कवायद का कितना व्यापक असर हुआ, इसका अनुमान इस तस्वीर को देखकर लगाया जा सकता है। ईरानी दूतावास ने इस तस्वीर को जारी करते हुए लिखा - 'हम आपकी दयालुता कभी नहीं भूलेंगे।'
ये उसी कौम के बच्चे हैं, जिन्हें देशभक्ति के ठेकेदार अक्सर संदेह की नजरों से देखते हैं। ये ज्यादातर उसी राज्य के बच्चे हैं, जहां की जमीन को तो ये ठेकेकार भारत का अभिन्न अंग मानते हैं, जो है भी, मगर अक्सर वहां के रहवासियों को नहीं।
आज अगर भारत लॉकडाउन लगाने की नौबत से बचा हुआ है तो इसकी एक वजह ईरान की यह इमोशनल जियोपोलिटिक्स भी है, जिसके तहत उसने भारतीय नागरिकों व बच्चों की उसके प्रति उदारता को सिर माथे लेकर होर्मुज से जहाजों को निकलने की अनुमति दी है (बेशक, यह अकेली वजह नहीं है)। इसने यह भी दर्शाया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े फैसलों में मजहब और घरेलू राजनीति को किनारे पर रखा जाता है। ईरान ने जिन चुनिंदा देशों के जहाजों को निकलने की अनुमति दी है, उनमें से तीन (भारत, चीन और रूस) इस्लामिक देश नहीं हैं।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान पर अमेरिकी हमले और खामनेई की मौत के बाद छह दिन तक भारत सरकार द्वारा चुप्पी साधे रखने की एक वजह देश की घरेलू राजनीति भी रही। हो सकता है, यह बात पूरी तरह सच न हो, मगर हर जगह धर्म के साथ फ्रंटफुट पर खेलने वाले हमारे कर्णधारों पर लगने वाले ऐसे आरोप से इनकार करते भी नहीं बनता है।
उम्मीद है, आज संकट में देश से 'टीम इंडिया' की तरह बर्ताव करने का आह्वान करने वाले और उनके सपोर्टर इन बच्चों के योगदान को संकट के बाद भी उसी तरह याद रखेंगे, जैसा याद रखने का वादा ईरान ने किया है।

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