By Jayjeet Aklecha
इन दिनों एक यूनिवर्सिटी के उस चीनी रोबोटिक डॉग को लेकर अच्छा हंगामा बरपा हुआ है, जिसे उसने कथित तौर पर अपना एआई इनोवेशन बताया था। लेकिन इस घटना के चार दिन पहले जो घटित हुआ, जरा उसकी चर्चा कर लेते हैं।
16 फरवरी को प्रधानमंत्री का पीटीआई को दिया एक इंटरव्यू जारी हुआ। इसमें उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरर बन गया है। इस दावे पर कोई सवाल नहीं है। न ही इस बहस में पड़ना उचित है कि स्मार्टफोन के हम वाकई मैन्युफैक्चरर हैं या असेम्बलर।
लेकिन उस यूनिवर्सिटी के एक दावे पर चली फिकरेबाजी के बीच मेरा छोटा-सा सवाल है- हम जो खुद को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा 'स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरर' बता रहे हैं, वे स्मार्टफोन आखिर किन देशों के हैं?
हमने एआई समिट में तो बड़ी-बड़ी बातें की हैं, लेकिन हम आज तक उस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए अपना कोई ऐसा स्मार्टफोन क्रिएट क्यों नहीं कर पाए, जो बहुत आम है? इस टेक्नोलॉजी पर चीन हर चौथे महीने एक नया फोन ले आता है और जिसकी मैन्युफैक्चरिंग/असेंबलिंग करते हुए हम बड़े गौरवान्वित होते हैं।
एपल को क्रिएट करने की कोशिश मत कीजिए, लेकिन क्या मोटोराला या रेडमी या ओप्पो जैसा कोई अपना फोन नहीं हो सकता? हम इन तमाम कंपनियों के फोन अपने यहां मैन्युफैक्चर या असेंबल करके निर्यात करते हैं और प्रधानमंत्रीजी इस पर अपनी पीठ थपथपाते हैं। बेशक, इससे भी देश को खूब कमाई होती है। जॉब्स मिलते हैं। यह भी देश हित में है, इससे इनकार नहीं है। लेकिन अगर हमारा अपना फोन होगा तो सोचिए, यह कमाई कितनी बढ़ जाएगी? कितने उच्च वेतनमान वाले जॉब्स यहां बनेंगे? वह मेक बाय इंडिया भी होगा और मेक इन इंडिया भी।
मुझे नहीं लगता कि इस पर न तो कभी प्रधानमंत्री ने कभी कुछ कहा होगा और न गलगोटिया यूनिवर्सिटी का मजाक उड़ाने वालों ने कुछ पूछा होगा। पीटीआई के सवाल पर जब प्रधानमंत्री कहते हैं – ‘In fact, globally celebrated phone brands are being produced in India' तो मन में सवाल उठता है कि हमारे प्रधानमंत्री यह कब कहेंगे - “In fact, India not only has globally celebrated brands, but we are also manufacturing them for the world.”
मेरी उस यूनिवर्सिटी के साथ कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन जिस चीनी तकनीकी को लेकर यह बखेड़ा खड़ा हुआ है, उस परिदृश्य को भी समझना जरूरी है। चीन अपने आप में कोई विशेष इनोवेटर नहीं है। उससे खासकर अमेरिकी और यूरोपीय पैटेंट धारक तो इस वजह से बहुत नाराज रहते हैं कि वह उनकी टेक्नोलॉजी की नकल इस तरह अकल से करता है कि वह चीन की अपनी तकनीक लगती है। एआई को लेकर हम बातें प्रोड्यूस करने के अलावा बहुत कुछ इनोवेटिव प्रोड्यूस करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि इसके लिए अरबों के निवेश की जरूरत है। तो क्या तब तक हमारी यूनिवर्सिटीज और हमारे आईआईटीज कम से कम जो तकनीक उपलब्ध है, उस पर काम करते हुए कुछ बेहतर प्रोड्यूस कर सकते हैं?
किसी की नकल करना इतना खराब भी नहीं है और न इसमें दुनिया के आगे हमारी नाक कटी है। जो यह कह रहा है, उसे दरअसल, साइंस या इनोवेशन की प्रोसेस के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है। हर टेक कंपनी या रिसर्चर या देश इसी तरह से आगे बढ़ता है, बशर्ते वह ऐसा करते-करते बाद में उसे इनोवशन में भी बदल देना जानता हो। सच तो यह है कि विज्ञान किसी की बपौती नहीं होती है। उसे देखकर, समझकर, कुछ अनुसरण करके, ढेर सारी गलतियां करके और कभी-कभी कुछ कॉपी करके आगे बढ़ा जाता है। हां, नकल में बहुत सारी अपनी अकल भी लगानी होती है, जो उस यूनिवर्सिटी को लगानी चाहिए थी। अब भी लगा सकती है। विज्ञान की यही खूबी है कि इसमें रास्ते कभी बंद नहीं होते।
पुनश्च... कांग्रेस और राहुल गांधी इस मसले को लेकर भी बहुत उत्साहित नजर आए। वे हर मसले पर जरा ज्यादा ही उत्साहित हो जाते हैं। क्या उन्हें जनरल नरवणे की किताब वाले असल चाइनीज इश्यू से भटकने की जरूरत है?

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