मंगलवार, 25 मार्च 2025

Satire : व्यंग्य लिखने की अनुमति प्रदान करने बाबत अनुरोध-पत्र


 

प्रति,

श्री फलाना साहेब
व्यंग्य परीक्षण अधिकारी
नई दिल्ली
विषय : आदरणीय मंत्री महोदय के संबंध में व्यंग्य लिखने की अनुमति बाबत
महोदय
सेवा में दंडवत अनुरोध है कि मैं सरकार में कार्यरत आदरणीय मंत्री महोदय (नाम का उल्लेख) के संबंध/समर्थन में एक व्यंग्य लिखना चाहता हूं। मैं इस व्यंग्य में आपकी व्यंग्य लेखन नियमावली, 2025 के निम्नलिखित नियमों का पालन करने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता हूं।
- नियम क्रमांक 1, कंडिका ख(2) के तहत मैं ऐसे किसी भी शब्द का उपयोग नहीं करूंगा, जिससे मंत्रीजी की भावनाओं को ठेस पहुंचती हो। इसके उप-नियम (3) के तहत समर्थकों/लठैतों की भावनाओं का भी पूरा खयाल रखूंगा।
- नियम क्रमांक 2 के 'भाई-भतीजवाद' खंड, कंडिका ग (3) के तहत मैं ऐसे किसी भी प्रकरण की बात नहीं करुंगा, जो यह बताता हो कि उन्होंने नियमों का उल्लंघन करके अपने परिवार के कितने सदस्यों को कितनी हेक्टेयर जमीन दिलवाने और कितने अयोग्य रिश्तेदारों को नौकरियां दिलवाने में सहायता की।
- नियम क्रमांक 4, कंडिका ख (2) के तहत मैं उनके द्वारा किए गए किसी भी दलबदल पर कोई टिप्पणी नहीं करुंगा, तदनुसार उनके प्रति 'गद्दार' जैसे असंसदीय शब्द का इस्तेमाल भी नहीं करंगा। ऐसे शब्द या इसी तरह के ऐसे शब्द जिससे इस प्रकार का भाव अभिव्यक्त होता हो, का उपयोग होने पर मैं अपने खिलाफ देश-द्रोह का मामला दर्ज किए जाने की सहर्ष अनुमति देने को तैयार रहूंगा।
- नियम क्रमांक 3, कंडिका घ (1) के तहत मैं उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उल्लेख नहीं करुंगा। उनके खिलाफ 23 मामलों की जो जांच लंबित है, उस संदर्भ में मैं 'जांच' शब्द का भी उपयोग नहीं करुंगा।
- नियम क्रमांक 1, कंडिका ख(6) के तहत मैं उस नियम का पूर्णरूपेण अनुपालन करुंगा, जिसमें मंत्रीजी की प्रशंसा में 10 पंक्तियां लिखना अनिवार्य हैं।
कृपया मुझे आदरणीय उक्त मंत्री महोदय के संबंध में व्यंग्य लिखने की सशर्त अनुमति प्रदान करने की कृपा करें।

भवदीय
ढिकाना कुमार
-------------

#kunal kamra, #कुणाल कामरा, #व्यंग्य, #satire, #जयजीत अकलेचा

मंगलवार, 18 मार्च 2025

हम Grok पर मजे ले रहे हैं, उधर हो सकता है, मस्क हमारे मजे ले रहे हों!

 

By Jayjeet Aklecha

पता नहीं क्यों, आज हम हर बात में खेल-तमाशे ढूंढ लेते हैं। अब लाखों-करोड़ों लोगों को ग्रोक (Grok) में मजा आ रहा है। कई लोग इस गलतफहमी में हैं कि देखिए कैसे ग्रोक ने मोदी और मोदीभक्तों की पोल खोल दी। हममें से किसी को इस बात का एहसास भी नहीं है कि इस कथित पोल-पट्‌टी पर अमेरिका में मस्क बैठे-बैठे हंस रहे हैं। आज मोदी विरोधी लोगों को आनंद आ रहा है, कल राहुल-गांधी परिवार के विरोधियों को आनंद आएगा।

 दरअसल, ग्रोक वह चैटबॉट है जो सीखने की प्रोसेस में है। कोई भी एआई बॉट रियल वर्ल्ड के डेटा से ही सीखता है। मस्क ने ट्विटर को खरीदा ही इसलिए था कि वे अपने आने वाले एआई मॉडल को उसके जरिये सिखा सकें (मस्क के लिए ट्विटर को खरीदना वैसा ही था, जैसे हम राह चलते कोई छोटी-मोटी चीज खरीद लेते हैं)। मस्क को ट्विटर की खरीदी से पहले ही एहसास हो गया था कि किसी भी एआई बॉट को सिखाने के लिए ट्विटर से बड़ा सोर्स कुछ और नहीं होगा। साल 2022 की शुरुआत में ही उन्होंने कह दिया था कि ट्विटर (अब X) की हर दिन की 50 करोड़ मानव पोस्ट किसी भी एआई को सीखने के लिए एक बहुत बड़ा खजाना है।

 मेरा अनुमान है कि उनके एआई बॉट को ट्विटर (X) की सामान्य पोस्ट्स से जितना सीखना था, सीख लिया। अब हो सकता है यह ग्रोक के लिए डायरेक्ट अग्रेसिव लर्निंग की प्रोसेस का दौर हो। और इसके लिए क्या करना था? बस, बाजार में एक पॉलिटिकल ट्रेंड फेंकना था। भारत में यह करना बहुत आसान है। यह दुनियाभर के समझदार लोगों को पता है। मस्क की कंपनी ने शायद यही किया है। करोड़ों लोगों ने दो-चार दिन में ही बैठे-ठाले, फ्री में ग्रोक को बहुत-सी बातें सिखा दी हैं। फिर हम सब मूर्ख फिर से एक कॉर्पोरेट घराने के टूल्स बन गए।

 

 

रविवार, 9 मार्च 2025

आखिर हमारे नेता लोग इतनी असहिष्णुता लाते कहां से हैं?

By Jayjeet Aklecha

लगता है हमारे नेताओं ने कबाड़ा करने का मानो बीड़ा उठा लिया है। हम धर्म और जाति के कटु बाणों से पहले से ही लहूलुहान हैं और अब नेताओं के तरकश में भाषा का एक नया तीर आ गया है (वैसे नया नहीं है, पर उसके फलक पर लगा जहर नया है)। बात तमिलनाडु के बाद महाराष्ट्र तक पहुंच गई है। आरएसएस के भैयाजी जोशी ने यह लाइन ‘पूरे मुंबई की भाषा मराठी नहीं है’ क्या कह दी, राजनीति का भाषाई वितंडा शुरू गया। सबसे पहले उद्धव बोले- ‘भैयाजी के खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज हो।'
फिर मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस को लगा कि वे इस राजनीति में पीछे ना रह जाए। तो विधानसभा में कहा कि मुंबई और महाराष्ट्र में रहने वालों को मराठी सीखनी ही चाहिए। अगर भविष्य में फड़णवीस को महासचिव बनाकर तमिलनाडु का प्रभार सौंपा जाता है तो क्या वे वहां रहकर तमिल सीखेंगे! फिर कनार्टक तो कन्नड़ा सीखेंगे, फिर असम तो क्या असमिया सीखेंगे? सवाल यह है कि क्या भारत के प्रांतों में कोई भारतीय अपनी पसंद की भाषा बोलकर नहीं रह सकता?.. और अगर नहीं रह सकता तो 1857 के पूर्व वाली स्थिति बहाल कर दीजिए। वैसे भी राज्यों के कर्णधार तो अब राजाओं वाली भाषा व जीवन-शैली का ही निर्वाह कर रहे हैं।
शीर्षक में मेरा जो सवाल था, अब उस पर आते हैं- आखिर नेता इतनी असहिष्णुता लाते कहां से हैं? इसका सीधा-सा कटु जवाब है- जनता से। ये तमाम नेता हम जनता को धर्म, जाति और भाषा पर इसलिए मूर्ख बना पा रहे हैं, क्योंकि हम बनना चाह रहे हैं। जिस दिन हम उनसे कहने लगेंगे : नेताजी, धर्म, जाति और भाषा को छोड़िए..., आप तो ये बताइए मेरी नौकरी का, मेरी पेंशन का, मेरी सेहत का, मेरे बच्चे की शिक्षा का, मेरी फसलों का, मेरे पशुओं के बारे में आपने क्या सोचा है? यकीन मानिए, उस दिन से सबकी सहिष्णुता लौट आएगी।
पुश्नच… औरंगजेब पर एक नेता ने कोई टिप्पणी की तो एक राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री की टिप्पणी थी – ‘उन्हें हमारे प्रदेश में भिजवा दीजिए। हम उनका इलाज करवा देंगे...।’ औरंगजेब जैसे शासकों की तो यह भाषा हो सकती है, मगर लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए नेता भी अगर उसी तरह की असहिष्णुता का निर्वाह करने लगेंगे, तो फिर हमें सोचना होगा कि हमारा सबसे महान लोकतंत्र किस राह पर आगे बढ़ चला है।