शनिवार, 27 दिसंबर 2025

(Aravali) आदमी और पहाड़

By Jayjeet 

भोली सूरत वाला वह आदमी पहाड़ के नीच आकर खड़ा हो गया।

पहाड़ भी भोला-भाला। आदमी की तरह केवल सूरत से नहीं, सीरत से भी।

उस भोली सूरत वाले आदमी ने पहाड़ को दद्दू कहकर पुकारा तो पहाड़ स्नेह से भर उठा।

पहाड़ को लगा कि यह आदमी उसके साथ कुछ सुकून के पल बिताने आया होगा। कुछ दिन बंशी बजाएगा और चला जाएगा। लेकिन पहाड़ को पता नहीं कि आदमी के भीतर की अशांति इतनी बढ़ गई है कि पहाड़ के साथ कुछ पल बिताना ही काफी नहीं है। अब वह पूरे पहाड़ को ही अपने में बिताना चाहता है।

‘कैसे आए हो बेटा? तुम आज ज्यादा ही चिंतित दिख रहे हो?’

‘हां, दद्दू बहुत बेचैन हूं, चिंता खाए जा रही है,’ भोले आदमी ने और भी ऊपरी भोलेपन से कहा।

 ‘बेटा, यह पूरा पहाड़ तुम्हारा है, तुम्हारे लिए है, तुम्हारे बच्चों के लिए है। मेरी गोद में आओ और सबकुछ भूल जाओ।’

पहाड़ कितना भी अनुभवी क्यों न हो, पर मन से वह भोला ही है, इतना भोला कि वह आदमी के ऊपरी भोलेपन को ताड़ नहीं पाया। अपने भीतरी कमीनेपन को भोलेपन से किस तरह छुपाया जा सकता है, मार्केटिंग गुरुओं की साेबत में आदमी यह सीख गया है।

आदमी ने अपने दुखियारे चेहरे पर मासूमियत का मुल्लमा लगाते हुए कहा, ‘दद्दू, मैं आपके साथ समय बिताने नहीं आया हूं। मैं इस समय सबसे बड़े मसले विकास को लेकर चिंतित हो रहा हूं।’

‘विकास?’ पहाड़ को अचानक से कुछ समझ में नहीं आया। आखिर भोले आदमी ने भी तो अचानक से विकास की चर्चा छेड़ दी थी।

आदमी ने अपने कमीनेपन पर भोलेपन की परत गहरी करते हुए कहा, ‘देखो, दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है। मैं चाहता हूं कि हम भी विकास करें, आप भी विकास करें। इसमें आपका भी साथ चाहिए। सबका साथ सबका विकास से ही तो हम आगे बढ़ेंगे।’

पकाड़ ने विकास का नाम तो सुन रखा है, पर इस शब्द का असल मतलब नहीं जानता। आखिर, लाखों साल पुरानी परवरिश है। कैसे जान सकता है?

पहाड़ ने कहा, ‘बच्चे, विकास मतलब कहीं वही तो नहीं? पेड़ों को काट देना, नदियों की धाराएं मोड़ देना। मैंने सुना है, अब तो मेरे जैसे कुछ पहाड़ भी खोद दिए गए हैं!’

भोली सूरत वाला आदमी चौंक गया। उसने पहाड़ को वाकई भोला ही समझा था, मगर वह उसकी उम्मीदों से थोड़ा कम भोला निकला।

भोले आदमी ने तुरंत गियर बदला। ‘नहीं नहीं। आप भी कहां विकास विरोधी लोगों के झांसे में आ गए। हमने पेड़ काटे तो लगाए भी हैं। खूबसूरत कॉलोनियों में ताड़ के लगाए पेड़, हाईवे के किनारे बोगनबेलिया की झाड़ियां, अहा! शोभा देखते ही बनती है। बेचारी नदियां भी यूं ही बही जा रही थीं, साल-दर-साल। हमने अपनी इन माताआंे को बांधों में शानदार जगह दी है। जो बच गईं, उनके किनारों पर शानदार घाट बनाए। एक-दो नहीं, लाखों-करोड़ों लोग उनकी पूजा करने आते हैं। और हां, हमने आपके भाई-बंधुओं को तराशकर और सुंदर बना दिए हैं। आप यह सब नजारा देखोगो को आश्चर्य से भर उठोगे। दिखाऊं?’

उस भोली सूरत के आदमी ने पहाड़ के जवाब का इंतजार किए बगैर ही लैपटॉप खोल पावर पाइंट प्रजेंटेशन की तैयारी शुरू कर दी। वह भोली सूरत वाला आदमी आज के जमाने का शातिर आदमी है। उसे पता है कि झांसा देने का पहला स्टेप पावर पॉइंट प्रजेंटेशन ही होता है। ‘दद्दू देखना विकास की कहानी, आप भी कहोगे, वाह इंसान, ये तूने क्या कर दिया कमाल!’

पहाड़ ने उसे रोकते हुए कहा, ‘ये तू तेरी मशीन को रहने दे भाई। मेरे पास तो बहुत समय है, पर तेरा समय कीमती है। ये तू अपना समय क्यों बर्बाद कर रहा है? तू तो सीधे मुझे यह बता कि आखिर मुझसे क्या चाहता है।’

‘मेरे पास तो बहुत समय है’, यह सुनकर पहाड़ के भोलेपन पर आदमी का कमीनापन भीतर ही भीतर हंस पड़ा। पर ऊपर से गंभीर होने का दिखावा करके पूरी मासूमियम से कहा, ‘दद्दू, आपको अपनी कीमत नहीं पता, मैं बस यही बताने आया हूं। आप एक बार यह प्रजेंटेशन देख लीजिए। इसमें आपको बताएंगे कि आपके भीतर कितना खजाना छुपा हुआ है। बस थोड़ा-सा निकालेंगे और फिर देखिएगा, आपके सानिध्य में हम इंसान विकास की िकतनी ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे।’

‘अरे, तू मेरी ऊंचाई को खत्म करके अपनी ऊंचाई चाहता है?’ पहाड़ के सामने इंसानी भोलेपन की परत उतरती जा रही है। पहाड़ गुस्से में थोड़ा थरथरा भी रहा है। ‘तू मुझे खोदना चाहता है? नहीं, मैं तुझे हाथ भी नहीं लगाने दूंगा।’

‘डोंट वरी दद्दू, हम आपकी ऊंचाई को नहीं छेड़ने वाले। वे जो टुच्ची-सी पहाड़िया हैं ना, सौ मीटर से नीची, बस उन्हें खोदेंगे। उनकी क्या औकात भला? वैसे भी ये विकास में बाधक हैं। हटाने दीजिए उन्हें।’

‘मुझे क्या इंसान समझ रखा है? वे भले ही छोटी हैं, लेकिन मेरे ही सिस्टम का हिस्सा हैं। उन्हें हाथ भी लगाकर देख लो।’

‘तो क्या कर लोगे, ऐ पहाड़?’ अब आदमी ने भी भोलेपन की केंचुली छोड़ दी है।

‘सरकार नाम की कोई चीज है कि नहीं! मैं उसके पास जाऊंगा। सुप्रीम कोर्ट के पास जाऊंगा। पर तेरी साजिश सफल नहीं होने दूंगा।’

आदमी अब पूरे कमीनेपन के साथ हंसने लगा है। पहाड़ वाकई उससे भी ज्यादा भोला निकला, जितना भोला इंसान ने उसे समझा था। हंसते हुए वहां से लौट आया है, वापस लौटने के लिए।

आदमी को लग रहा है कि पहाड़ बेमतलब में अपनी चिंता में मरा जा रहा है। लेकिन मूर्ख आदमी को पता नहीं कि पहाड़ अपने लिए नहीं, आदमी के लिए ही चिंतित है। पहाड़ न रहा तो आदमी भी नहीं रहेगा।  

 (घोषणा : प्रख्यात व्यंग्यकार श्री ज्ञान चतुर्वेदी जी के एक व्यंग्य ‘आदमी और नदी’ से प्रेरित।)

(#aravalli_protest, #अरावली पर्वत खनन विरोध, #अरावली पर्वत सुप्रीम कोर्ट)

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

बहस पर बहस करने वाले बस जावेद साहब की आखिरी लाइन पर गौर करें...!

By Jayjeet


दो दिन पहले लल्लनटॉप पर ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व को लेकर जावेद अख्तर और मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच हुई बहस के बाद कई तरह की बहसें हो रही हैं। ईश्वर एक ऐसा विषय है, जिस पर अंतहीन बहस हो सकती है। लेकिन करीब दो घंटे की इस बहस में सबसे अच्छी बात मुझे वह लगी, जो जावेद साहब ने सबसे अंत में कही। शायद पूरी बहस देखने के बाद भी अधिकांश लोगों को इल्म नहीं होगा कि वे आखिर में सबसे खूबसूरत बात क्या कह गए... इसकी चर्चा आगे...

रवीश कुमार सहित कई लोगों ने आशंका जताई है कि इस बहस ने देश में साम्प्रदायिकता के प्रसार के लिए लोगों को नया मसाला दे दिया है। इस समय भयंकर ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहे इस देश में यह दिक्कत तो है कि ऐसी सार्थक बहसों के साथ भी ऐसी आशंकाएं चिपक जा रही हैं। फिर भी, धार्मिक ध्रुवीकरण तो किसी एक इलेक्शन या किसी लल्लू-पल्लू नेता के भाषण से भी हो जाता है। तो बहस से ही सही...

एक विडंबना यह भी कि इस बहस को कई लोग हार-जीत के तौर पर देख रहे हैं। यह बहस एक नास्तिक और एक आस्तिक (बिलिवर) के बीच थी। मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी केवल ईश्वर/खुदा/गॉड के अस्तित्व के समर्थक के तौर पर प्रतिनिधि भर थे। उनकी जगह कोई हिंदू पंडित या ईसाई पादरी भी हो सकता था। इसलिए उन्हें इस्लाम का प्रतिनिधि मानने के बजाय तमाम 'आस्तिकों' का प्रतिनिधि मानना चाहिए, जिनकी ईश्वर के आस्था है। इसलिए बहस किसी धर्म के खिलाफ या धर्म के समर्थन में नहीं कही जा सकती। लेकिन दुर्भाग्य से जहां एक तबका इसे मुस्लिम धर्म की विजय बता रहा है, तो वहीं दूसरा तबका जावेद अख्तर के साथ केवल इसलिए खड़ा नजर आ रहा है, क्योंकि वे एक मौलवी के तर्कों का जवाब दे रहे थे (इनमें अधिकांश लोग वे भी हो तो आश्चर्य नहीं, जो जावेद साहब को गाहे-बगाहे पाकिस्तान जाने का हुक्म सुनाते रहते हैं)।

तमाम साम्प्रदायिक समस्याओं के बावजूद देश इस तरह के विषयों पर बहस करने लगा है, यह सबसे सकारात्मक लक्षण है। जैसा कि जावेद साहब ने कहा कि क्या यह बहस आज से सौ साल पहले हो सकती थी? एक व्यक्ति ईश्वर/खुदा पर सवाल उठाए, क्या यह सोचा जा सकता था? मुस्लिम सम्प्रदाय की परिभाषा में जावेद साहब की कई बातों को एक 'काफिर' द्वारा की गई ईशनिंदा मानकर उनके खिलाफ फतवे जारी किए जा सकते हैं। अच्छी बात है कि अब तक ऐसे किसी फतवे के जारी होने की कोई खबर नहीं है और उम्मीद है कि ऐसा होगा भी नहीं। यह बड़ी बात है और यह उसी बदलाव का संकेत है, जिसकी जावेद साहब भविष्य में उम्मीद रखते हैं।

खुदा/ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, इस विचार को किसी पर थोपा नहीं जा सकता। सभी को लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे इसे मानें या न मानें। लेकिन जावेद साहब ने इसके जरिए तमाम धर्मों की प्रासंगिकता पर सवाल जरूर उठाए हैं और इस पर आगे भी बहस होनी चाहिए। बहस होनी चाहिए कि आखिर अगर मजहब केवल लड़ना सिखाएं तो हमें ये धर्म या मजहब क्यों चाहिए?

अंत में वही बात, जिसके लिए मुझे इतना सबकुछ लिखना पड़ा। जावेद साहब ने चलते-चलते कहा- 'बहस के बाद अब मैं इन मौलवी साहब के साथ खाना खाने वाला हूं' ... यही सबसे अच्छी और खूबसूरत बात थी। इस सामान्य से वाक्य के भी संकेत गहरे हैं : असहमति में भी इतनी गुंजाइश होनी चाहिए कि साथ खाना खाया जा सके, आगे की चर्चा की जा सके, हम कुछ दूसरों से ग्रहण कर सके, कोई दूसरा हमसे ग्रहण कर सके... और यह बात हर क्षेत्र में लागू होनी चाहिए - असहमतियों का सह-अस्तित्व।

तो, अगर आप अपनी-अपनी वजहों से दोनों वक्ताओं का समर्थन कर रहे हैं तो कृपया इनसे इस बात की सीख भी जरूर लीजिए।

#Javedakhtar #javedakhtarvsmuftishamail

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

नदियों के सत्यानाश के लिए और 20 करोड़ लोग क्यों चाहिए?

By Jayjeet
दुनिया की 10 शीर्ष स्वच्छ नदियों में से सारी की सारी उन देशों में हैं, जहां नदियों की पूजा नहीं की जाती। भारत की कभी सर्वाधिक स्वच्छ नदी मानी जाने वाली उमंगोट भी अब इस सूची से बाहर हो चुकी है।
आज अचानक से नदियों का जिक्र इसलिए क्योंकि कल ही संघ के एक विद्वान नेता दत्तात्रेय होसबले ने बड़ी मासूमियत से पूछा था कि अगर मुस्लिम लोग नदी की पूजा करें तो क्या हर्ज है?
इन दिनों दूसरों के गिरेबान में झांकने का शौक कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। पूजा के नाम पर हम हिंदू लोग नदियों का कितना सत्यानाश कर रहे हैं, इसकी चिंता करने या इस पर कोई सकारात्मक विमर्श शुरू करने के बजाय हमें फिक्र इस बात की ज्यादा हो रही है कि विधर्मी लोग नदियों की पूजा क्यों नहीं कर रहे? यह उतना ही बड़ा पाखंड है, जितना कि भ्रष्टाचार में पगे लोग वंदे मातरम गाते हुए न गाने वालों को पाकिस्तान भेजने की धमकी देते हैं।
हाल ही में एक खबर आई थी कि केदरानाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालु लोग अपने आराध्य स्थल पर इतना कचरा छोड़ आए कि उसे नीचे लाने में सरकार को करोड़ों खर्च करने होंगे। यह विडंबना नहीं कि हम उन्हीं चीजों का सत्यानाश करने पर तूले रहते हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं? और ऊपर से हम चाहते हैं कि इस इकोसिस्टम में 10-20 करोड़ लोगों का भार और आ जाए? इसी संदर्भ में एक प्रसंग का उल्लेख समीचीन है। हमारे एक मित्र जापान गए थे। वहां एक मंदिर में बहुत ढूंढने पर उन्हें बड़ी मुश्किल से एक डस्टबिन मिला। पता चला कि जापानी तो अपना कचरा वापस साथ ले जाते हैं। हमारे जैसे भारतीयों के लिए ही शायद एक-आध डस्टबिन लगाया गया था। जापान भी आस्थावान देश है। लेकिन दो आस्थावान देशों के नागरिकों में भी कितना अंतर है? और क्यों है? लोहिया जी के शब्दों में, दुनिया में सर्वाधिक ढोंगी कोई कौम है तो वह भारतीय है।
होसबले यहीं नहीं रुके। (जैसा कि अखबारों में छपा है), उन्होंने कहा, 'मुस्लिमों को पर्यावरण संरक्षण के लिए नदियों, पेड़ों और सूर्य का सम्मान करने से कोई नुकसान नहीं होगा।'
मैं इससे सहमत हूं। लेकिन सम्मान करने की बात पहले अपने घर के लोगों से कहिए। हिंदुओं से कहिए कि पूजा के बाद अपना कचरा मां गंगा या मां नर्मदा के हवाले करने के बजाय साथ ले जाएं और अगर एक भी पेड़ कटे तो उसके लिए उतना ही हंगामा करने के लिए तैयार रहें, जितना की गौ-रक्षा के नाम पर करते हैं। आखिर देश में करीब एक बिलियन लोग हिंदू हैं। पर्यावरण और पेड़ों को बचाने के लिए इन्हें और 20 करोड़ों लोगों की क्या जरूरत? वैसे भी सनातनी परंपरा में तो मंदिरों से भी पहले पेड़ों की पूजा की जाती थी? तो अगर हम वाकई सनातनी हैं तो स्वयं अपने कर्तव्य को पूरा करें, फिर दूसरों को ज्ञान दें।
पुनश्च... हाल ही में दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी टेम्स में पैर धोते एक युवक का वीडियो वायरल हुआ था। बताने की जरूरत नहीं कि वह भारतीय मूल का युवक था। लदंन प्रशासन ने युवक पर जुर्माना लगाकर भविष्य में ऐसा न करने के प्रति सख्ती से आगाह किया था। तो नदियों की पूजा ऐसे भी तो की जा सकती है?