![]() |
By Jayjeet Aklecha
यहां आपको कॉन्टेंट मिलेगा कभी कटाक्ष के तौर पर तो कभी बगैर लाग-लपेट के दो टूक। वैसे यहां हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे कई नामी व्यंग्यकारों के क्लासिक व्यंग्य भी आप पढ़ सकते हैं।
![]() |
By Jayjeet Aklecha
By Jayjeet
By Jayjeet Aklecha
कई लोगों को भारत को ‘विश्वगुरु’ बोलते हुए एक किस्म की मानसिक शांति का एहसास होता है। इसमें संस्कृति से जुड़ाव महसूस करते हुए दुनिया पर भारत के वर्चस्व की आकांक्षा दिखती है। लेकिन क्या हम विश्वगुरु केवल कहने मात्र से बन जाएंगे?
हमें बीते 10 दिनों के दौरान हुई
दो घोषणाओं पर गौर करना चाहिए। ये आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) को लेकर है। पहली घोषणा
अमेरिका में हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के दो दिन बाद ही 22 जनवरी
को डोनाल्ड ट्रंप ने एआई के विकास के लिए 500 अरब डॉलर (43,34,500 करोड़ रुपए) के (प्राइवेट
फर्म्स के साथ) ज्वाइंट वेंचर की घोषणा की। दूसरी घोषणा कल आए भारत के केंद्रीय बजट
में हुई। इसमें एआई के लिए 500 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान रखा गया है। इन दोनों की
तुलना करने के लिए जमीन-आसमान का अंतर वाला मुहावरा भी बहुत छोटा पड़ जाएगा।
बेशक, एआई को लेकर हममें से किसी
को कुछ पता नहीं है और इसलिए हम इसे बड़ा खतरा मान सकते हैं (और मानना भी चाहिए)। ऐसे
में अगर सरकार की मंशा एआई को हतोत्साहित करने वाली है, तो यह अच्छा है। लेकिन सवाल
यह भी है कि केवल ऐसी मंशा रखने से भर क्या होगा? क्या हम दुनिया से (खासकर अमेरिका
और चीन से) आते इससे खतरे को रोक पाएंगे? यह केवल शुतुरमुर्गी रवैया है कि हम सिर छुपाकर
समझ लेंगे कि तूफान से बच गए। लेखक युवाल नोआ हरारी ने अपनी ताजा-तरीन किताब
‘नेक्सस' में इसे और स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि जिस तरह पर्यावरण के नियमों
का पालन करने भर से जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचा नहीं जा सकता, उसी तरह एआई को
नियंत्रित करने या हतोत्साहित करने से हम इसके खतरों से नहीं बच सकते, क्योंकि ये दोनों
स्थानीय नहीं, वैश्विक समस्याएं हैं।
मुझे पक्का भरोसा है कि हमारे यहां की कोई भी सरकार इतनी समझदार या संवेदनशील
नहीं हो सकती कि उसने एआई के लिए इतना अल्प बजट केवल इसलिए रखा है, क्योंकि उसकी सुमंशा
इसके खतरों को रोकना है। दरअसल, यह हमारी तमाम सरकारों की वैज्ञानिक सोच के प्रति उस
उदासीनता का प्रतीक है, जो आज से नहीं है, और जिसे वे दशकों से बरतते आ रही हैं। वैज्ञानिक
अनुसंधान और वैज्ञानिक मानसिकता ही हमें वैश्विक ताकत में बदल सकती है, इसको लेकर सरकार
के स्तर पर कोई सोच नहीं है, न रही है। हम आज भी महज हमारे विशाल बाजार के भरोसे खुद
को वैश्विक ताकत में बदलने का ख्वाब देख रहे हैं। आज भी हममें से कई लोग, दुर्भाग्य
से सरकार-शासन और वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों मंे बैठे लोग भी, मायथोलॉजी के आधार पर उन
प्राचीन ‘इनोवेशन’ पर गर्व करते अघाते नहीं कि कैसे दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी
हमारे यहां हुई या कैसे हमने दुनिया को विमान उड़ाना सिखाया। अक्षत गुप्ता जैसे लेखक
इसे ‘सत्यालॉजी’ कहकर इस भ्रम को और गैर-जरूरी बढ़ावा देते हैं। दुर्भाग्य यह भी कि
हमारे यहां किसी सरकार की सफलता का पैमाना यह बन जाता है कि वह किसी बड़े धार्मिक आयोजन
को कितने अच्छे तरीके से हैंडल कर पाती है।
भारत सरकार एआई को प्रोत्साहित न करें, अच्छी बात है। लेकिन एक यह तथ्य
हमें डरा रहा है कि इसकी अवहेलना करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आईबीएम एआई एडॉप्शन
इंडेक्स की मानें तो एआई को स्वीकार करने के मामले में दुनिया में नंबर वन पर भारत
है (59 फीसदी बिजनेस कंपनियों ने एआई को एडॉप्ट करने की इच्छा जताई है), जबकि हमारे
पास अपना कोई एआई नहीं है। हो सकता है आगे जाकर हम इस पर भी ‘गर्व’ करने लगे कि भारत
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती एआई कंट्री है, जैसे हम स्मार्टफोन के सबसे बडे एक्सपोर्टर
होने पर गर्व करते हैं, जबकि हमारे पास अपना एक ढंग का स्मार्टफोन तक नहीं है।
By Jayjeet
गोडसे ने आज फिर बापू की डायरी ली और उसमें कुछ लिखा।
गांधी ने पूछा- अब कितना हो गया है रे तेरा डेटा?
एक लाख क्रॉस कर गया बापू। 1 लाख 10 हजार 234… गोडसे बोला
गांधी – मतलब सालभर में बड़ी तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
गोडसे : हां, 12 परसेंट की ग्रोथ है। बड़ी डिमांड है …. गोडसे ने मुस्कराकर कहा…
गांधीजी ने भी जोरदार ठहाका लगाया…
-----
नए-नए अपॉइंट हुए यमदूत से यह देखा ना गया। गोडसे के रवाना होने के बाद उसने अनुभवी यमदूत से पूछा- ये क्या चक्कर है सर? ये गोडसे नरक से यहां सरग में बापू से मिलने क्यों आया था?
अनुभवी यमदूत – यह हर साल 30 जनवरी को नर्क से स्वर्ग में बापू से मिलने आता है। इसके लिए उसने स्पेशल परमिशन ले रखी है।
नया यमदूत – अपने किए की माफी मांगने?
अनभवी – पता नहीं, उसके मुंह से तो उसे कभी माफी मांगते सुना नहीं। अब उसके दिल में क्या है, क्या बताए। हो सकता है कोई पछतावा हो। अब माफी मांगे भी तो किस मुंह से!
नया – और बापू? वो क्यों मिलते हैं उस हरामी से? उसके दिल में भले पछतावा हो, पर बापू तो उसे कभी माफ न करेंगे।
अनुभवी – अरे, बापू ने तो उसे उसी दिन माफ कर दिया था, जिस दिन वे धरती से अपने स्वर्ग में आए थे। मैं उस समय नया-नया ही अपाइंट हुआ था।
नया – गजब आदमी है ये… मैं तो ना करुं, किसी भी कीमत पे..
अनुभवी – इसीलिए तो तू ये टुच्ची-सी नौकरी कर रहा है…
नया – अच्छा, ये गोडसे, बापू की डायरी में क्या लिख रहा था? मेरे तो कुछ पल्ले ना पड़ रहा।
अनुभवी – यही तो हर साल का नाटक है दोनों का। हर साल गोडसे 30 जनवरी को यहां आकर बापू की डायरी को अपडेट कर देता है। वह डायरी में लिखता है कि धरती पर बापू की अब तक कितनी बार हत्या हो चुकी है। गोडसे नरक के सॉफ्टवेयर से ये डेटा लेकर आता है।
नया – अच्छा, तो वो जो ग्रोथ बोल रहा था, उसका क्या मतलब?
अनुभवी – वही जो तुम समझ रहे हो। पिछले कुछ सालों के दौरान गांधी की हत्या सेक्टर में भारी बूम आया हुआ है।
नया – ओ हो, इसीलिए इन दिनों स्वर्ग में आमद थोड़ी कम है…
अनुभवी – अब चल यहां से, कुछ काम कर लेते हैं। वैसे भी यहां मंदी छाई हुई है। नौकरी बचाने के लिए काम का दिखावा तो करना पड़ेगा ना… हमारी तो कट गई। तू सोच लेना….
(Disclaimer : इसका मकसद गांधीजी को बस अपनी तरह से श्रद्धांजलि देना है, गोडसे का रत्तीभर भी महिमामंडन करना नहीं… )
#gandhi #godse
By Jayjeet
नए साल की शुभकामनाओं का सिलसिला अब तक जारी है। इस बार कतिपय शुभकामनाओं के आगे ‘अंग्रेजी' (नव वर्ष) जोड़कर यह संकेत दिए गए कि शुभकामनाएं तो ले लीजिए, लेकिन ज्यादा खुश मत होइए, क्योंकि ‘ये हमारा नव वर्ष नहीं है।’ और कुछ ने तो बाकायदा ‘हमारा नया साल तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से' तक के मैसेज प्रसारित किए। बीजेपी के तेज-तर्रार प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का बीजेपी मुख्यालय में इस तरह से नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए वह वीडियो भी खूब वायरल हुआ और किया गया कि ‘पोप ग्रेगरी 13वें द्वारा 1582 में करेक्टेड और अंग्रेजों द्वारा 1752 में अंगीकृत इस अंग्रेजी नववर्ष के प्रथम दिन की आप सभी को बधाई।'* विश्वदीप नाग
अपनी उद्यमशीलता से जुड़े कीर्तिमानों और विवादास्पद बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाले इलॉन मस्क दुनिया की सबसे चर्चित हस्तियों में गिने जाते हैं। उनके विराट और रहस्यमय व्यक्तित्व और उनकी जीवन यात्रा को समझना आसान नहीं है। टेस्ला और स्पेसएक्स जैसी अरबों डॉलर की कंपनियों के शिल्पकार के रूप में वे दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं। 2022 में, उन्होंने ट्विटर को ख़रीदने की बोली के साथ दुनियाभर में सुर्खियाँ बटोरी थीं। दक्षिण अफ़्रीका की अपनी जड़ों से आगे जाकर मस्क ने अपने लिए काफ़ी नाम कमाया है।
दक्षिण अफ़्रीकी पत्रकार और लेखक माइकल व्लिसमस ने 'इलॉन मस्क: रिस्किंग इट ऑल' में कामयाबी की जीवंत किंवदंती बन चुके इस व्यक्तित्व की सच्ची कहानी का सिलसिलेवार वर्णन प्रस्तुत किया है। मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने 'इलॉन मस्क : भविष्य के वास्तुकार' शीर्षक से इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है। गहन शोध के बाद लिखी गई यह आकर्षक किताब कई मिथकों को दूर करती है तथा मस्क के पिता से जुड़े विवाद के अन्य पक्षों को भी प्रस्तुत करती है।
व्लिसमस अन्य जीवनीकारों से अलग
व्लिसमस उन अन्य जीवनीकारों से अलग हैं, जिन्होंने मस्क के पीछे छिपे विशाल व्यक्तित्व को समझने की कोशिश की है। व्लिसमस के बारे में ख़ास बात यह है कि मस्क और उन्होंने प्रिटोरिया में एक ही स्कूल में पढ़ाई की है। लिहाज़ा, व्लिसमस उस माहौल को अच्छी तरह से जानते हैं, जिसने मस्क की जीवन यात्रा और कामयाबी को आकार दिया।
यह जीवनी इसलिए इतनी समृद्ध है, क्योंकि इसमें मस्क को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले और दक्षिण अफ़्रीका में उनके प्रारंभिक वर्षों का हिस्सा रहे लोगों के प्रत्यक्ष अनुभवों को समाविष्ट किया गया है, जो इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करती है: मस्क वास्तव में हैं कौन?
दुर्लभ जानकारी
व्लिसमस ने अपने अनुभवों को मस्क के बचपन के दोस्तों, शिक्षकों और परिचितों के अनुभवों के साथ मिलाकर 1980 के दशक में दक्षिण अफ़्रीकी शिक्षा प्रणाली की तस्वीर पेश की है। यह एक ऐसी दुनिया थी, जिसमें समझौता न करने वाला अनुशासन, सामाजिक विभाजन, नस्लीय तनाव और हिंसक उत्पात शामिल थे।
यह जीवनी मस्क के बचपन के दिनों की खोज है, जैसा कि वास्तव में वहाँ मौजूद लोगों ने बताया। व्लिसमस पाठकों को मस्क के शुरुआती वर्षों के बारे में दुर्लभ जानकारी प्रदान करते हैं, इससे पहले कि युवा मस्क आज के उद्योग जगत के विवादास्पद बादशाह बन गए, जिसके लिए उन्होंने सब कुछ जोखिम में डाल दिया और अपनी तक़दीर ख़ुद लिख दी।
जीवनी यह पड़ताल करती है कि मंगल ग्रह पर बसने की भव्य योजनाओं की बात करने वाले इस नवाचारी धन्नासेठ की दृष्टि के केंद्र में क्या है? वे जोखिम से इतना बेखौफ़ क्यों हैं? अजीबोगरीब प्रिटोरिया स्कूली लड़के के रूप में कॉमिक्स और विज्ञान कथाएँ पसंद थीं, लेकिन उनके शुरुआती साल और पारिवारिक पृष्ठभूमि उनकी शानदार महत्वाकांक्षाओं को आकार देने में किस प्रकार महत्वपूर्ण थे ? मस्क के विकास बारे में लेखक नई अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं, जिसमें पिता के साथ उनके परेशान रिश्ते भी शामिल हैं।
विलक्षण हस्ती का बख़ूबी चित्रण
यह कृति मस्क के दक्षिण अफ़्रीकी बचपन से लेकर 17 साल की उम्र में कैनेडा और फिर अमेरिका जाने तक, उनके उल्लेखनीय जीवन का पता लगाते हुए एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो मानवता में आशावाद को बनाए रखने और ‘सितारों के बीच’ मनुष्यों के लिए भविष्य खोजने की दिशा में प्रेरित है। इसमें उनकी व्यावसायिक उपलब्धियों के साथ-साथ, उनके निजी जीवन के भी अनेक क़िस्से हैं, चाहे वह मॉडल और गायकों के साथ उनके संबंध हों, या बच्चों के दिलचस्प नाम। मस्क बहुत ही विलक्षण व्यक्ति हैं, यह जीवनी इसे बख़ूबी चित्रित करती है।
शानदार अनुवाद
अँग्रेज़ी में लिखी गई मूल कृति के हिंदी संस्करण की ख़ासियत इसका शानदार अनुवाद है, जो वरिष्ठ पत्रकार जयजीत अकलेचा ने किया है। वे शाब्दिक अनुवाद से बचे हैं और उन्होंने इसकी सुबोधगम्यता को क़ायम रखा है। इसकी वजह से जीवनी का हिंदी अनुवाद बेहद पठनीय हो गया है।
( समीक्षक वरिष्ठ पत्रकार हैं , संपर्क - 62607 74189)
(#elonmusk, #risking_it_all, #MichaelVlismas, इलॉन मस्क पर किताबें, इलॉन मस्क हिंदी, #jayjeet aklecha)
By Jayjeet Aklecha
By Jayjeet Aklecha/ जयजीत अकलेचा