बुधवार, 20 मई 2026

गर्मी बहुत है? मगर इतनी भी नहीं कि यह हमारे चुनावों में राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन सके... !


By Jayjeet Aklecha
इस समय हर शहर, हर कस्बे, हर जगह, हर कोने से एक ही बात उठ रही है- गर्मी बहुत है...।
क्या वाकई बहुत है?
नहीं जी। अभी भी इतनी नहीं है कि हम बारिश की चंद बूंदों के बाद भी इसे याद रख सके...
इतनी भी नहीं है कि कटते पेड़ों की खबरें हमें एंग्जाइटी की हद तक बेचैन कर सके...
इतनी भी नहीं कि यह हमारे नेता लोगों को हमें सुरक्षित पर्यावरण की गारंटी देने के लिए मजबूर कर सके...
तो देखिए, अब भी गर्मी इतनी कहां है?
हमारी-आपकी कॉलोनी में जो जगह बगीचे के लिए रखी गई थी, वहां धर्म के नाम पर या किसी नेता की पार्किंग का कब्जा देखकर क्या हमें गुस्सा आता है?
नया मकान खरीदते हुए क्या हम अपने बिल्डर से यह पूछते हैं कि हरियाली के नाम पर सैकड़ों गैलन पानी पीने वाली कथित हरी घास और केवल ताड़ के पेड़ क्यों?
अगर हम किसान हैं तो कभी खुद से पूछते हैं कि अपने खेतों में दूर-दूर तक एक भी पेड़ क्यों नहीं? या कभी थे तो वे आज कहां हैं?
क्या बड़े-बड़े आर्किटैक्ट खुद से पूछते हैं कि ठंडे यूरोपीय देशों की नकल करने के फेर में वे यह कैसे भूल गए कि भारत जैसे गर्म देशों की इमारतों में इतने शीशों का क्या काम?
और बड़ा सवाल यह भी- हर छोटे-बड़े मसले पर तूफान खड़ा करने वाले हमारे राजनीतिक दल कहां हैं? कहीं नहीं हैं। इनकी प्राथमिकताओं में पर्यावरण सबसे आखिर में है। सत्तारूढ़ भाजपा के 2024 के घोषणा पत्र को देखें। इसने अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को पेज नंबर 67 पर जगह दी है, जो उसके घोषणा पत्र का समापन बिंदु है।
और भारत के लिए राष्ट्रीय संकट बन रहे इस मुद्दे पर विपक्ष कहां है? विपक्ष को छोड़िए। सरकार की छोटी-मोटी विफलताओं पर तुरंत ट्वीट करने वाले राहुल गांधी कहां हैं? इस मसले पर राहुल गांधी कहीं हो भी नहीं सकते, क्योकि स्वयं उनकी पार्टी के लिए भी पर्यावरण आखिरी प्राथमिकता है। भाजपा की तर्ज पर कांग्रेस ने भी अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को जगह दी है पेज 41 पर। यह उसका आखिरी अध्याय है।
और सबसे बड़ा सवाल हमारे मतदाताओं से भी- क्या हम गर्मी या पर्यावरण जैसे मसलों पर वोट देते हैं? नहीं। कोई किसी को वोट इसलिए देता है क्योंकि उसे धर्म खतरे में नजर आता है तो कोई सामाजिक न्याय के खतरे पर वोट देता है। धरती पर खतरा हमें केवल अप्रैल-मई में ही याद आता है और फिर उसे अगले साल तक के लिए मुल्तवी कर देते हैं।
तो सवाल यह है कि अभी हम क्या करें? मुझसे चार दिन पहले ही किसी ने पूछा था- गर्मी ज्यादा है? मैंने कहा, नहीं जी। इतनी भी नहीं कि हम इस गर्मी के मसले पर राष्ट्रव्यापी वोटिंग कर सके।
तो आइए, अभी तो हम 50-55 डिग्री तक का इंतजार करते हैं!!!

सोमवार, 18 मई 2026

हमारे नेताओं को 145 करोड़ लोग भी कम पड़ रहे हैं? इसलिए और बच्चे पैदा करने के लिए बांटी जाएंगी रेवड़ियां!

 

chandababu naidu birth rate

By Jayjeet Aklecha
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू उन कुछ चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जो पारंपरिक नेतागीरी वाली बिरादरी से थोड़े हटकर दिखाई देते हैं। पहनावे में भी और विजन को लेकर भी। उन्होंने दिखाया है कि धर्म और जाति की घृणित राजनीति के बीच भी इनोवेशन, नवाचार और विजन को राजनीतिक हथियार के तौर पर साधा जा सकता है। ऐसे में उनकी सरकार द्वारा दंपतियों को तीन और चार बच्चे पैदा करने पर प्रोत्साहन (पढ़ें प्रलोभन) देने वाली घोषणा बेहद निराशाजनक है।
इससे पहले आरएएस प्रमुख भी कई बार कह चुके हैं कि देश के हर परिवार को तीन बच्चे पैदा करना चाहिए। इन नेताओं की राजनीति के उकसावे में आकर अन्य नेतागण भी बच्चे पैदा करने के लिए रेवड़िया बांटने लगे तो क्या आश्चर्य?
नायडू की दलील है कि भविष्य में जनसंख्या का संतुलन बनाए रखने के लिए समाज को जन्म दर बढ़ाने की दिशा में काम करना होगा। बेशक, यह उन देशों के लिए जरूरी है, जहां पहले से ही बेहद कम आबादी है, जहां काम ज्यादा है, हाथ कम हैं। जहां सैकड़ों एकड़ जमीन पड़ी है, लेकिन उन्हें जोतने वाला कोई नहीं है। लेकिन भारत, खासकर आंध्रप्रदेश को लेकर उनकी चिंता की बुनियाद आधे-अधूरे सच पर खड़ी है।
अनुमानों के अनुसार भले ही भारत में जन्म दर घट रही है (और यह नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए हाल के वर्षों तक कठोर प्रयास किए गए हैं), लेकिन इसके बावजूद आबादी पर सबसे सटीक आकलन करने वाली संस्था यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन की ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024' की रिपोर्ट भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में इसी दर से घटती रफ्तार के बावजूद भारत की आबादी को स्थिर होने में अभी भी 35 से 40 साल लग जाएंगे और यह करीब 170 करोड़ के आसपास पहुंचकर स्थिर होगी। फिर वहां से धीरे-धीरे कम होनी शुरू होगी, बशर्ते मौजूदा जन्म दर में बढ़ोतरी न हो।
आज 145 करोड़ की आबादी में ही देश की सांसें फूल जाती हैं। एक बड़ी आबादी के पास काम नहीं है। एक बड़ी आबादी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो रही है। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज मुहैया करवाना पड़ रहा है। ऐसे में मौजूदा जन्मदर के हिसाब से जब हम 170 करोड़ पर पहुंच जाएंगे तब क्या होगा? और अगर हमारे लोग ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले प्रलोभन में आ गए, तब?
नायडू अपने फैसले के समर्थन में दक्षिण कोरिया जैसे देशों का हवाला देते हैं, जहां की आबादी तेजी से घट रही है। तथ्य यह है कि अकेले आंध्र की आबादी पूरे दक्षिण कोरिया देश की आबादी से ज्यादा है। नायडू को पता होगा कि उनकी राज्य की आबादी को भी स्थिर होने में कम से कम 10 से 15 वर्ष लग जाएंगे। इस अवधि के बाद भी अकेले आंध्र प्रदेश की आबादी 6 करोड़ से ज्यादा ही होगी। प्रति व्यक्ति आय,जीवनशैली और कई तरह की सुविधाओं को लेकर दक्षिण कोरिया केवल आंध्र प्रदेश ही नहीं, पूरे भारत से आगे है। तो पहले कोशिश वह देने की होनी जानी चाहिए जो ये विकसित देश दे चुके हैं- अपने लोगों को बेहतर जीवनशैली।
इसलिए हमारे नेताओं से करबद्ध आग्रह है कि इस तरह की बेतुकी बात करने या फैसले लेने से पहले काम करने के इच्छुक हर व्यक्ति को काम मिल सके, यह सुनिश्चित कीजिए। लगातार बढ़ती गर्मी के बीच हर परिवार को कूलर के लिए पानी तो छोड़िए, उसे शुद्ध पेयजल नसीब हो सके, यह सुनिश्चित कीजिए। एक झटके में ही एक शहर में गंदे पानी से 30-35 लोग मर जाते हैं और नेता लोग घंटा बजाते हुए चल देते हैं। देश के करोड़ों लोगों को बहुत सी बुनियादी चीजें मुहैया करवाना बाकी है। पहले वह करवाइए, फिर जन्म दर की चिंता कीजिए।
फिर एक सवाल और भी है, जो कहीं ज्यादा विचारणीय है। आखिर ये बच्चे पैदा कौन करेगा? एक स्त्री ही ना? मतलब, बस वह अपनी देह को कुर्बान करे, ताकि हमारा समाज या हमारा देश चलता रहे! बल्कि, हकीकत में आपकी राजनीति चलती रहे। बेशक, मां बनना एक विशिष्ट आत्मीय गौरव की बात होती है (जिसका वर्णन शायद स्त्री ही कर सके)। लेकिन आर्थिक प्रलोभन देकर उसे बच्चे जनने की मशीन बनाना एक बिल्कुल अलग बात है, अमानवीयता के बेहद करीब।
तो जब कोई नेता तीन या चार बच्चे पैदा करने का प्रलोभन या ज्ञान दें, तो उससे यह सवाल भी पूछना बनता है कि आखिर ये पैदा कहां से होंगे? ये सवाल कम से कम देश की स्त्रियों को तो अवश्य करने चाहिए।

मंगलवार, 12 मई 2026

फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम... एक अच्छी रेवड़ी!!! क्या हमारी सरकारों को इस पर सोचने का वक्त मिलेगा?


public transport india
By Jayjeet Aklecha
हमारे कर्णधार कभी-कभी बड़ी खूबसूरत बातें कह देते हैं। वे कह रहे हैं - कुएं खोदिए। पानी के लिए। अच्छा आइडिया है। मगर सवाल यह है कि आग लग चुकी है तो अब कुएं खोदने से कितना फर्क पड़ेगा?
जब वे कहते हैं कि हमें पब्लिक टांसपोर्ट से चलना चाहिए तो मैं कहता हूं- हां, मैं चलने को तैयार हूं, मगर इसका सिस्टम है कहां? और यह मैं मप्र की राजधानी भोपाल में बैठकर पूछ रहा हूं, किसी छोटे-मोटे शहर से नहीं। यह वही राजधानी है, जहां वर्षों से डबल इंजन ही नहीं, ट्रिपल इंजन सरकारें रही हैं। भारी-भरकम बजट वाली नगर सरकार पर भी समान विचारधारा वालों का आधिपत्य रहा है।
भोपाल में करीब 7 साल पहले मेट्रो प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। कहां तक पहुंचा? 7 साल में 7 किमी। इस बीच, बसों का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम खत्म हो गया। कुछ अफसर कुछ साल पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टमों का अध्ययन करने विदेश यात्राओं पर गए थे। लौटे तो भोपाल और इंदौर में करोड़ों रुपए में बीआरटीएस बनाए गए। मगर कुछ साल में इन्हें खत्म कर दिया गया। खत्म करने में करोड़ों और खत्म हुए। हमारे नेताओं और अफसरों की प्रायोरिटी में ये करोड़ों रुपए है, कोई सिस्टम नहीं।
ये पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम अच्छे थे या बुरे, यह अलग बहस का विषय हो सकता है, लेकिन कड़वा सच यही है कि सत्ता में बैठे लोगों में यह क्लेरिटी ही नहीं है कि उन्हें करना क्या है? और यह सिर्फ आज की सरकारों पर सवालिया निशान नहीं है। हर सरकार हमेशा भगवान भरोसे ही रही है। आज की सरकारें जरा ज्यादा हैं, क्योंकि यही 'भगवान' इन्हें वोट भी दिलाते हैं।
हमारे यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर हर शहर में बस मेट्रो का शिगूफा छोड़ा जा रहा है। लेकिन ढंग की बसें तक नहीं हैं। उनकी टाइमिंग, शहर के लगभग हर इलाके तक कनेक्टिविटी, अर्ली मॉर्निंग टु लेट नाइट तक उनकी सर्विस, यह सब तो बाद की बातें हैं।
कुछ देशों ने अपने यहां के बड़े शहरों में टेक ड्रिवन सुगम और फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम से न केवल परिवेश को ठीक किया है, बल्कि भारी मात्रा में वो डॉलर भी बचाए हैं, जिनकी चिंता अब हमारे कर्णधारों को हो रही है।
सुविधाजनक और फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट एक अच्छी रेवड़ी हो सकती है। यह वोट भी दिला सकती है और निश्चित ही देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा तो बचाएगी ही। लेकिन यह बात तब समझ में आएगी, जब केंद्र में बैठे कर्णधार हर चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ना बंद कर देंगे। जब किसी राज्य के चुनाव को महज चुनाव की तरह लेंगे, किसी भी तरह जीतने की जिद की तरह नहीं। तब सोचने के लिए समय होगा, तब कुछ लॉन्ग टर्म विजन सामने आएंगे।
(तस्वीर: भोपाल में यदा-कदा दिखाई देने वाली पब्लिक ट्रांसपोर्ट की एक बस, जिसमें ऐसे दृश्य आम हैं।)