By Jayjeet Aklecha
इस समय हर शहर, हर कस्बे, हर जगह, हर कोने से एक ही बात उठ रही है- गर्मी बहुत है...।
क्या वाकई बहुत है?
नहीं जी। अभी भी इतनी नहीं है कि हम बारिश की चंद बूंदों के बाद भी इसे याद रख सके...
इतनी भी नहीं है कि कटते पेड़ों की खबरें हमें एंग्जाइटी की हद तक बेचैन कर सके...
इतनी भी नहीं कि यह हमारे नेता लोगों को हमें सुरक्षित पर्यावरण की गारंटी देने के लिए मजबूर कर सके...
तो देखिए, अब भी गर्मी इतनी कहां है?
हमारी-आपकी कॉलोनी में जो जगह बगीचे के लिए रखी गई थी, वहां धर्म के नाम पर या किसी नेता की पार्किंग का कब्जा देखकर क्या हमें गुस्सा आता है?
नया मकान खरीदते हुए क्या हम अपने बिल्डर से यह पूछते हैं कि हरियाली के नाम पर सैकड़ों गैलन पानी पीने वाली कथित हरी घास और केवल ताड़ के पेड़ क्यों?
अगर हम किसान हैं तो कभी खुद से पूछते हैं कि अपने खेतों में दूर-दूर तक एक भी पेड़ क्यों नहीं? या कभी थे तो वे आज कहां हैं?
क्या बड़े-बड़े आर्किटैक्ट खुद से पूछते हैं कि ठंडे यूरोपीय देशों की नकल करने के फेर में वे यह कैसे भूल गए कि भारत जैसे गर्म देशों की इमारतों में इतने शीशों का क्या काम?
और बड़ा सवाल यह भी- हर छोटे-बड़े मसले पर तूफान खड़ा करने वाले हमारे राजनीतिक दल कहां हैं? कहीं नहीं हैं। इनकी प्राथमिकताओं में पर्यावरण सबसे आखिर में है। सत्तारूढ़ भाजपा के 2024 के घोषणा पत्र को देखें। इसने अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को पेज नंबर 67 पर जगह दी है, जो उसके घोषणा पत्र का समापन बिंदु है।
और भारत के लिए राष्ट्रीय संकट बन रहे इस मुद्दे पर विपक्ष कहां है? विपक्ष को छोड़िए। सरकार की छोटी-मोटी विफलताओं पर तुरंत ट्वीट करने वाले राहुल गांधी कहां हैं? इस मसले पर राहुल गांधी कहीं हो भी नहीं सकते, क्योकि स्वयं उनकी पार्टी के लिए भी पर्यावरण आखिरी प्राथमिकता है। भाजपा की तर्ज पर कांग्रेस ने भी अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को जगह दी है पेज 41 पर। यह उसका आखिरी अध्याय है।
और सबसे बड़ा सवाल हमारे मतदाताओं से भी- क्या हम गर्मी या पर्यावरण जैसे मसलों पर वोट देते हैं? नहीं। कोई किसी को वोट इसलिए देता है क्योंकि उसे धर्म खतरे में नजर आता है तो कोई सामाजिक न्याय के खतरे पर वोट देता है। धरती पर खतरा हमें केवल अप्रैल-मई में ही याद आता है और फिर उसे अगले साल तक के लिए मुल्तवी कर देते हैं।
तो सवाल यह है कि अभी हम क्या करें? मुझसे चार दिन पहले ही किसी ने पूछा था- गर्मी ज्यादा है? मैंने कहा, नहीं जी। इतनी भी नहीं कि हम इस गर्मी के मसले पर राष्ट्रव्यापी वोटिंग कर सके।
तो आइए, अभी तो हम 50-55 डिग्री तक का इंतजार करते हैं!!!

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