हमारे कर्णधार कभी-कभी बड़ी खूबसूरत बातें कह देते हैं। वे कह रहे हैं - कुएं खोदिए। पानी के लिए। अच्छा आइडिया है। मगर सवाल यह है कि आग लग चुकी है तो अब कुएं खोदने से कितना फर्क पड़ेगा?
जब वे कहते हैं कि हमें पब्लिक टांसपोर्ट से चलना चाहिए तो मैं कहता हूं- हां, मैं चलने को तैयार हूं, मगर इसका सिस्टम है कहां? और यह मैं मप्र की राजधानी भोपाल में बैठकर पूछ रहा हूं, किसी छोटे-मोटे शहर से नहीं। यह वही राजधानी है, जहां वर्षों से डबल इंजन ही नहीं, ट्रिपल इंजन सरकारें रही हैं। भारी-भरकम बजट वाली नगर सरकार पर भी समान विचारधारा वालों का आधिपत्य रहा है।
भोपाल में करीब 7 साल पहले मेट्रो प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। कहां तक पहुंचा? 7 साल में 7 किमी। इस बीच, बसों का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम खत्म हो गया। कुछ अफसर कुछ साल पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टमों का अध्ययन करने विदेश यात्राओं पर गए थे। लौटे तो भोपाल और इंदौर में करोड़ों रुपए में बीआरटीएस बनाए गए। मगर कुछ साल में इन्हें खत्म कर दिया गया। खत्म करने में करोड़ों और खत्म हुए। हमारे नेताओं और अफसरों की प्रायोरिटी में ये करोड़ों रुपए है, कोई सिस्टम नहीं।
ये पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम अच्छे थे या बुरे, यह अलग बहस का विषय हो सकता है, लेकिन कड़वा सच यही है कि सत्ता में बैठे लोगों में यह क्लेरिटी ही नहीं है कि उन्हें करना क्या है? और यह सिर्फ आज की सरकारों पर सवालिया निशान नहीं है। हर सरकार हमेशा भगवान भरोसे ही रही है। आज की सरकारें जरा ज्यादा हैं, क्योंकि यही 'भगवान' इन्हें वोट भी दिलाते हैं।
हमारे यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर हर शहर में बस मेट्रो का शिगूफा छोड़ा जा रहा है। लेकिन ढंग की बसें तक नहीं हैं। उनकी टाइमिंग, शहर के लगभग हर इलाके तक कनेक्टिविटी, अर्ली मॉर्निंग टु लेट नाइट तक उनकी सर्विस, यह सब तो बाद की बातें हैं।
कुछ देशों ने अपने यहां के बड़े शहरों में टेक ड्रिवन सुगम और फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम से न केवल परिवेश को ठीक किया है, बल्कि भारी मात्रा में वो डॉलर भी बचाए हैं, जिनकी चिंता अब हमारे कर्णधारों को हो रही है।
सुविधाजनक और फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट एक अच्छी रेवड़ी हो सकती है। यह वोट भी दिला सकती है और निश्चित ही देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा तो बचाएगी ही। लेकिन यह बात तब समझ में आएगी, जब केंद्र में बैठे कर्णधार हर चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ना बंद कर देंगे। जब किसी राज्य के चुनाव को महज चुनाव की तरह लेंगे, किसी भी तरह जीतने की जिद की तरह नहीं। तब सोचने के लिए समय होगा, तब कुछ लॉन्ग टर्म विजन सामने आएंगे।
(तस्वीर: भोपाल में यदा-कदा दिखाई देने वाली पब्लिक ट्रांसपोर्ट की एक बस, जिसमें ऐसे दृश्य आम हैं।)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Thanks for your comment