By A Jayjeet
Photo : कतिपय
कारणों से मैसूर श्री ने अपनी खिंचवाने मना कर दिया। इसलिए उनकी जगह स्वर्ण भस्म श्री
की तस्वीर दी जा रही है। वे एलीट वर्ग की राष्ट्रवादी विचारधारा से ताल्लुक रखती है।
यहां आपको कॉन्टेंट मिलेगा कभी कटाक्ष के तौर पर तो कभी बगैर लाग-लपेट के दो टूक। वैसे यहां हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे कई नामी व्यंग्यकारों के क्लासिक व्यंग्य भी आप पढ़ सकते हैं।
By A Jayjeet
Photo : कतिपय
कारणों से मैसूर श्री ने अपनी खिंचवाने मना कर दिया। इसलिए उनकी जगह स्वर्ण भस्म श्री
की तस्वीर दी जा रही है। वे एलीट वर्ग की राष्ट्रवादी विचारधारा से ताल्लुक रखती है।
By Jayjeet
By A. Jayjeet
पहलगाम के क्रूर आतंकी हमले के बाद हमारी सेना ने जिस तरह पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के ठिकानों को नेस्तनाबूद किया, उस पर प्रत्येक भारतीय गर्व कर सकता है और कर भी रहा है। लेकिन जिस वक्त हर हिंदुस्तानी पाकिस्तान को समूल नष्ट किए जाने के जज्बे से लबरेज था, उसी समय दोनों मुल्कों ने सीजफायर का एलान कर दिया। समग्र मानवीय चिंताओं के मद्देनजर युद्ध कभी भी बेहतर विकल्प नहीं हो सकते। इसलिए बड़े हल्कों में राहत की सांस भी ली गई और इसका स्वागत भी किया गया।
सीजफायर के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने श्रेय लेने में तनिक भी देरी नहीं की। यहां तक कि उन्होंने यह भी दावा किया कि दोनों देशों के साथ व्यापार बंद करने की धमकी देकर उन्होंने उन्हें युद्धविराम के लिए राजी किया। इसका लाजिमी तौर पर भारत सरकार ने तुरंत खंडन भी किया।
हमें मानना चाहिए कि ट्रम्प का यह दावा पूरी तरह से गलत ही होगा। लेकिन इसके बावजूद हमें कम से कम एक यह चिंता तो जरूर होनी चाहिए- अमेरिका आज भी भारत और पाकिस्तान दोनों को एक तराजू पर तौलता है। बीच संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) पाकिस्तान को एक अरब डॉलर का लोन स्वीकृत कर देता है और हम लाचारी से इस कड़वे घूंट को पी जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
यह तथ्य इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करता है कि हम भले ही दुनिया का सबसे बड़ा बाजार होने और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एक होने के लाख दावे कर लें, लेकिन ये दावे हमें एक देश के तौर पर वे सम्मान नहीं दिलाते, जिसकी हर भारतीय आकांक्षा करता है। आखिर ऐसा क्यों?
इसका एक सिरा राष्ट्र के नाम दिए गए प्रधानमंत्री के उसी सम्बोधन से खींचा जा सकता है, जिसमें उन्होंने बड़े ‘गर्व’ के साथ ‘मेड इन इंडिया’ की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि आज भारत ‘मेड इन इंडिया’ हथियारों से लड़ाई रहा है। ऑपरेशन सिंदूर से दो दिन पहले प्रधानमंत्री ने एक कार्यक्रम में इसी तरह ‘गर्व’ के भाव के साथ यह भी कहा था कि आज भारत (‘मेड इन’ स्मार्टफोन की बदौलत) स्मार्टफोन का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है।
‘मेड इन इंडिया’ बड़ी आकर्षक शब्दावली है, जो कई लोगों को गर्व से भर देती है। लेकिन अब देश को ‘मेड इन इंडिया’ से आगे निकलकर ‘मेड बाय इंडिया’ की ओर बढ़ने की दरकार है। अगर युद्धक सामग्री की बात करें तो चाहे रफाल हो या एस-400 (जिसे हमने बड़ा सुंदर नाम दे दिया- 'सुदर्शन') या ब्रम्होस, इनमें से अधिकांश हमारे इनोवेट किए हुए नहीं हैं। या तो वे बाहर से खरीदे गए हैं (जैसे रफाल) या फिर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत भारत में बनाए गए हैं (जैसे सुदर्शन और ब्रह्मोस)। बेशक, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की दूरदर्शी सोच के चलते आज भारत के पास अनेक स्वदेशी मिसाइलें हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि वे पर्याप्त नहीं हैं। बात केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। न्यू एज इनोवेशन में हम कहां है? हमारे पास अपना एआई या अपना ऑपरेटिंग सिस्टम तो छोड़िए, स्वयं का एक स्मार्टफोन तक नहीं है।
‘मेड इन इंडिया’ के लिए हमारा असेंबल कंट्री बनना पर्याप्त होता है, जो हम बन चुके हैं। लेकिन ‘मेड बाय इंडिया’ के लिए हमें इनोवेटर कंट्री बनना होगा। हमारे पास टैलेंट की कमी नहीं है, लेकिन टैलेंट और इनावेशन के बीच में फैला हुआ है ‘ब्यूरोक्रेटिक टेरोरिज्म' यानी करप्शन और असंगत टैक्स रिजीम। यह हमारी इनोवशन स्प्रिट को एक तरह से खत्म कर देता है।
हमें समझना होगा कि आज के दौर में दुनिया में असल सम्मान उस देश को मिलता है, जो इनोवेट करता है। असल रुतबा भी उसी का होता है। ट्रम्प ने हमें युद्धविराम के लिए एक रात में समझा दिया। क्या रूस को समझा पाए? या चीन ट्रम्प की धमकियों से डर गया? अब तो टैरिफ मसलों पर अमेरिका चीन के साथ वार्ता करने जा रहा है।
इसलिए सीमा पार के टेरोिरज्म के साथ-साथ हमें अपनी सीमाओं के भीतर के इस ‘ब्यूरोक्रेटिक टेरोरिज्म' से भी निपटना होगा। तभी हम असल में एक इनोवेशन कंट्री बन सकेंगे। और तब कोई ट्रम्प हमें युद्धविराम के लिए मनाने या धमकाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा। हो सकता है, तब हमें शायद युद्ध की भी जरूरत न पड़े।
- जयजीत
चीखता-चिल्लाता एंकर बोला,
मुट्ठियां ताने नेता बोला,
वीर रस का कवि भी गरजा,
सोशल मीडिया वीर भी बरसा।
सब बोले , हे सरकार,
अब तो युद्ध जरूरी है!
इस मौके पर दे दिया मैंने भी अपना ऑफर
मैं सरकार तो नहीं, मगर पत्रकार हूं
कम से कम इतना तो फर्ज निभा सकता हूं
आपको बॉर्डर तक छोड़कर आ सकता हूं
एंकर भड़क उठा, बोला हड़ककर,
गंभीर घड़ी में कर रहे हो मजाक लपककर!
अगर मैं चला गया जंग के मैदान, दे दी जान
तो चीख-चीखकर शहीदों की कौन सुनाएगा दास्तान ...? हें...
नेता बोला, हंसते-हंसते,
इस साइड हो या उस साइड
फितरत में हम एक हैं
हम लड़ते नहीं, बस लड़वाते हैं,
कभी जंग, कभी धर्म के झंडे फहराते हैं
चल हट स्साले, हमें काम करने दें,
हथियार नहीं, भाषण चलाने दें
वीर रस का वो कवि, चेहरे पर था वीभत्सता का बोलबाला
मेरे इस ऑफर पर बड़ी मासूमियत से बोला,
भाई, रणभूमि नहीं, मंच मेरी धरती है,
शहादत नहीं, कविता मेरी शक्ति है।
शहीदों की चिताओं पर प्यारे गीत सजाऊंगा,
वीरों के नाम मुट्ठियां तानकर वीरगान सुनाऊंगा!
और अब आई सोशल मीडिया वीर की बारी
मैंने कहा- चल, करते हैं बॉर्डर तक की सवारी!
उसने पूछा- क्यों?
ओह हो...लगता है फिर हो गया है शॉर्ट टर्म मेमोरी का शिकार
भूल गया जंग वाली सारी तकरार
पता नहीं, चाइना ने ऐसा क्या बोला कि
चाइनीज मोबाइल से ही
फिर से चाइना के खिलाफ करने लगा खेला
तो मॉरल ऑफ द पोयम...?
बाकी सब तो निभा रहे अपनी जिम्मेदारी,
नेता, एंकर, कवि और एफबी-एक्स की फौज सारी।
बस बचे रह गए सैनिक असली रणवीर,
सब पूछ रहे, कब आएगी इनकी भी बारी?
आ गई गर बारी तो हम भी पीछे नहीं रहेंगे
बजाएंगे खूब ताली और पीटेंगे जमकर थाली..
पक्का प्रॉमिस...!!!
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(तो नेता क्या करता है? अपने बंगले में बैठकर अंगुर खाता है या पीता है, और क्या!!)
By Jayjeet
By Jayjeet Aklecha
आज हम कितने विचित्र विरोधाभासी दौर में जी रहे हैं। एक तरफ हम बेहद संवेदनशील हैं। नाजुक-सी भावनाएं। जरा सा किसी ने कुछ कहा नहीं कि चटक जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ संवेदनाओं से विहीन। इसकी कई मिसालें तो हमें अपनी-अपनी अंतरात्माओं में ही मिल जाएंगी।
यहां संवेदनहीनता के जिस हालिया मामले का जिक्र कर रहा हूं, वह अनंत अंबानी का है। वो कुछ बीमारियों से ग्रस्त हैं। खबरों के मुताबिक, कुछ ऐसी गंभीर बीमारियां, जिनसे किसी भी सभ्य व विवेकशील इंसान को उनके प्रति संवेदना होनी चाहिए, भले ही वो भारत के सबसे धनकुबेर के पुत्र ही क्यों न हों।
हम अरसे से उनका मजाक उड़ते देख रहे हैं। स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने हाल ही में महाराष्ट्र के एक नेता का बिल्कुल उचित मजाक उड़ाया था। लेकिन जब वे अनंत जैसे बीमार व्यक्ति की बॉडी शेमिंग करते हैं तो ऐसे कॉमेडियन और उस भद्दी कॉमेडी पर हंसने वाले मानसिक बीमारों पर लज्जा आने लगती है।
ताजा मामला अपनी पदयात्रा के दौरान अनंत द्वारा कुछ चिकन को बचाने का है। ऐसी खबरें और इसकी तस्वीरें सामने आते ही कई लोग उन पर टूट पड़े। इनमें धुरंधर यूट्यूबर ध्रुव राठी भी हैं। उनका यह सवाल वाजिब है कि आखिर अनंत इससे कितने चिकन बचा लेंगे? लेकिन समस्या उनके पूछने के अंदाज से है। यह अंदाज बताता है कि मकसद सवाल उठाना नहीं, अनंत के इस प्रयास का मजाक उड़ाना है। और इससे यह भी पता चलता है कि बड़ी सेलेब्रिटी बनना और बड़ा दिलवाला बनना, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। आपने नॉलेज तो अर्जित कर लिया, लेकिन विज्डम से दूर रहे। ज्ञानी होना आसान है, विवेकशील नहीं, क्योंकि इसके लिए ज्ञान के साथ 'शील' जरूरी है।
हो सकता है आपको मोदी पसंद न हो। और इसीलिए आपको उनके कथित दोस्त मुकेश अंबानी भी पसंद नहीं होंगे? ठीक है, भू-राजनीति का एल्गोरिदम आप इंसानी रिश्तों में भी ले लाइए कि दुश्मन का दोस्त दुश्मन! लेकिन इसके बावजूद किसी के बीमार बेटे का मजाक उड़ाने का हक कम से कम इंसानी सभ्यताओं में तो किसी ने किसी को नहीं दिया है... हां, अगर आप किसी एलियन सभ्यता में रह रहे हैं, तो अलग बात है... तब मुबारक हो ऐसी सभ्यता।
#anantambani Kunal Kamra Dhruv Rathee #jayjeetaklecha #जयजीत अकलेचा
प्रति,
By Jayjeet Aklecha
पता नहीं क्यों, आज हम हर बात में खेल-तमाशे ढूंढ लेते हैं। अब लाखों-करोड़ों लोगों को ग्रोक (Grok) में मजा आ रहा है। कई लोग इस गलतफहमी में हैं कि देखिए कैसे ग्रोक ने मोदी और मोदीभक्तों की पोल खोल दी। हममें से किसी को इस बात का एहसास भी नहीं है कि इस कथित पोल-पट्टी पर अमेरिका में मस्क बैठे-बैठे हंस रहे हैं। आज मोदी विरोधी लोगों को आनंद आ रहा है, कल राहुल-गांधी परिवार के विरोधियों को आनंद आएगा।
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पता नहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में ऐसे कौन-से वामपंथी अधिकारी
बैठे हुए हैं, जिन्होंने पवित्र गंगा नदी के पानी को प्रदूषित बता दिया। खैर, महंत
योगीजी ने उप्र विधानसभा में कह दिया कि गंगा का पानी इतना पवित्र है कि उसका आचमन
भी किया जा सकता है तो हम मान सकते हैं कि हां, ऐसा ही होगा! उन्होंने इस रिपोर्ट को
महाकुंभ को बदनाम करने की साजिश भी करार दिया (साजिश के इस आरोप का जवाब क्या केंद्र
सरकार देगी?) वैसे अगर संगम के जिस आम एरिया में जहां आम लोग पवित्र स्नान वगैरह कर
रहे हैं, वहां योगीजी अपनी पूरी कैबिनेट और वरिष्ठ अफसरों के साथ जाकर उस पानी का आचमन
करके दिखाते तो यह बोर्ड के साजिशकर्ता अधिकारियों को मुंहतोड़ जवाब होता...!
दिक्कत यह भी है कि हम नदियों को केवल पवित्र मानते हैं, उन्हें पवित्र रखने की कोशिश
नहीं करते। अगर नदियों को पवित्र रखना हमारा मकसद होता तो महाकुंभ या ऐसे ही आयोजनों
को लेकर हमारी सरकारों की रणनीति कुछ अलग होती। लेकिन भारत में ऐसी अलग नीति की उम्मीद
नहीं कर सकते...इसलिए हमें ‘पूरब और पश्चिम’ के उस उस फिल्मी गीत को दोहराकर ही संतुष्ट
रहना होगा कि ‘हम उस देश के वासी हैं, जहां नदियों को भी माता कहकर बुलाते हैं’ (फिर
एक कड़वा विरोधाभास... महिलाओं के खिलाफ छोटे-बड़े अपराधों के मामले में भारत की स्थिति
अनेक विकासशील देशों से बदतर है)
#जयजीत अकलेचा
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By Jayjeet Aklecha