By Jayjeet Aklecha
एक तरफ खाई और दूसरी तरफ भी खाई। अगर कुएं का ऑप्शन भी होता तो थोड़ी तसल्ली के साथ खुदकुशी की जा सकती थी। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे तमाम नेताओं ने हमारे लिए यह रास्ता भी नहीं छोड़ा है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव हो रहे हैं। दो चरण के चुनाव हो भी चुके हैं और किसी दल के पास आज कोई मुद्दा तक ही नहीं है। हाल के वर्षों में दुनिया के किसी भी सभ्य देश में ऐसा कोई उदाहरण नजर नहीं आता, जब देश के प्रधानमंत्री ने अपने ही देश के एक पूरे समुदाय को हाशिये पर पटकने को अपना मुद्दा बना लिया हो। हमारे यहां यह हो रहा है, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा। फिर भी हम हमारे 'लोकतंत्र' पर फुले नहीं समाते।
ठीक है, मोदी एंड कंपनी को भी छोड़ देते हैं। लेकिन उनके सामने मौजूद देश का सबसे 'युवा एवं उत्साही एवं बिंदास' नेता भी कोई ऐसा विजन पेश नहीं कर पा रहा है, जिसको देखकर हम सब कहे- हां, हां इसी की तो हमें तलाश थी। देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी को लेते हैं। राहुल गांधी ने इसे अपना सबसे बड़ा मुद्दा बना रखा है। अच्छा है। लेकन इसको लेकर उनके पास भी ले-देकर केवल एक यही उपाय है- देश का सरकारीकरण। उन्हें लगता है कि केवल सरकारी पदों को भरने भर से यह समस्या दूर हो जाएगी। एक पढ़े-लिखे व्यक्ति को भी अगर यह भान नहीं है कि सरकारीकरण करने से देश की प्रोडक्टिविटी किस स्तर पर पहुंच जाएगी तो चुनावी मैदान में खड़े अनपढ़ों की तो क्या बात ही करें। राहुल का दूसरा मुद्दा है- आरक्षण। बाकी? नील बंटे सन्नाटा।
अब सवाल जनता का। क्या हमें इन्हीं जुमलों, बदजुबानियों, वादों या गारंटियों पर वोट देना चाहिए? बेशक, चुनावों में वोट डालना जरूरी है। यह कर्त्तव्य भी है। इसलिए इस कर्त्तव्य का पालन पूरी शिद्दत से करना चाहिए। लेकिन वोट डालने जितना ही महत्वपूर्ण एक कर्त्तव्य और हैं- सत्ताधारी लोगों से, राजनीतिक दलों से, नेताओं से सवाल पूछना। आज सबसे बड़ा संकट ही सवाल पूछने की हिम्मत का हिम्मत हारना है। हममें से शायद ही कोई यह सवाल पूछ रहा है या पूछने की हिम्मत कर रहा है कि आज 75 साल के बाद भी देश के लोगों को मुफ्त अनाज और आरक्षण की बैसाखियों की जरूरत क्यों पड़ रही है? और पड़ रही है तो फिर आप किस मुंह से हमसे अपने-अपने दल के लिए वोट मांग रहे हैं?
तो आइए वोट डालें, मगर सवाल पूछने की नैतिकता भी बरकरार रखें। वोट डालने जितना ही जरूरी सवाल पूछना भी है, फिर चाहे कोई भी दल हो, किसी भी दल की सरकार हो। और इस सवाल में नैतिक बल तब होगा, जब आप आज किसी के पक्ष में खड़े नहीं होंगे। वोट देने का मतलब 'ज्यादा खराब' और 'उससे भी ज्यादा खराब' में से किसी एक को चुनने की मजबूरी कतई नहीं होनी चाहिए। आखिर यह समझौता क्यों?
हो सकता है NOTA की कोई संवैधानिक वकत ना हो, मगर यह ताकत बन सकता है अपने असंतोष को जताने की...
आइए, हम सभी लोकतंत्र को शुक्रिया कहें, और वोट जरूर डालें...!!
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